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  • वैश्विक आर्थिक और सैन्य शक्ति के रूप में भारत

    विषय 1: वैश्विक आर्थिक और सैन्य शक्ति के रूप में भारत

    21वीं सदी में भारत की दिशा एक “संतुलनकारी शक्ति” से आगे बढ़कर एक “नेतृत्वकारी शक्ति” के रूप में स्थापित हो चुकी है। यह परिवर्तन दो मुख्य स्तंभों पर आधारित है: एक मज़बूत और उच्च-विकास करती अर्थव्यवस्था, तथा तीव्र गति से आधुनिक हो रही सैन्य शक्ति। 2024–25 के परिप्रेक्ष्य में भारत केवल दक्षिण एशिया का क्षेत्रीय दिग्गज नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था में एक निर्णायक ध्रुव बन चुका है—जो केवल वैश्विक परिस्थितियों पर प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि परिणामों को आकार देने की क्षमता भी रखता है।

    A. आर्थिक महाशक्ति: वैश्विक विकास का इंजन

    भारत की आर्थिक कहानी “Fragile Five” से “Top Five” तक पहुँच चुकी है। 4 ट्रिलियन डॉलर (Nominal GDP) को पार करते हुए और Purchasing Power Parity (PPP) के आधार पर विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित होकर, भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से विकसित होती प्रमुख अर्थव्यवस्था है।

    1. व्यापक आर्थिक स्थिरता और बड़े पैमाने का प्रभाव

    भारत की अर्थव्यवस्था का पैमाना देश को गहरी कूटनीतिक शक्ति प्रदान करता है।

    GDP रैंकिंग:

    2025 में भारत नाममात्र GDP के आधार पर विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित हो चुका है, जापान को पीछे छोड़ते हुए और जर्मनी के समीप पहुँचते हुए।
    अनुमान है कि 2027 तक भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा—केवल अमेरिका और चीन उसके आगे होंगे।

    विदेश मुद्रा भंडार:

    2024 के अंत तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 700 बिलियन डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर को पार कर चुका है।
    यह विशाल भंडार भारत को वैश्विक वित्तीय अस्थिरताओं से सुरक्षा देता है और भारत को आर्थिक दबावों से मुक्त रखकर स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने में सक्षम बनाता है।

    विकास दर:

    विश्व अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ रही है, लेकिन भारत निरंतर 6.5%–7% की विकास दर बनाए हुए है।
    यह स्थायी वृद्धि भारत को विश्व की आर्थिक वृद्धि का प्रमुख इंजन बनाती है, जो दुनिया की कुल आर्थिक वृद्धि में लगभग 16% का योगदान देता है।

    2. डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI) क्रांति

    भारत ने “डिजिटल पब्लिक गुड्स” पर आधारित एक अनूठा आर्थिक मॉडल विकसित किया है।

    UPI (Unified Payments Interface):

    भारत दुनिया के लगभग 46% रियल-टाइम डिजिटल लेनदेन का संचालन करता है।
    UPI की सफलता अब वैश्विक स्तर पर अपनाई जा रही है—फ्रांस, सिंगापुर और UAE जैसे देशों ने भारतीय भुगतान प्रणाली को अपने सिस्टम में एकीकृत किया है।

    इंडिया स्टैक:

    पहचान (Aadhaar), भुगतान (UPI) और डेटा (Account Aggregators) के त्रिकोण ने भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को औपचारिक रूप में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
    DBT (Direct Benefit Transfers) ने सरकारी व्यय में भारी बचत कराई है, क्योंकि इससे भ्रष्टाचार और रिसाव कम हुए हैं, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया गया है।

    3. विनिर्माण और अवसंरचना (PLI का तेज़ प्रभाव)

    भारत “सेवाओं की अर्थव्यवस्था” से आगे बढ़कर “वैश्विक विनिर्माण केंद्र” बनने की दिशा में तेज़ी से बढ़ रहा है।

    PLI योजनाएँ:

    इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, ऑटोमोटिव सहित 14 प्रमुख क्षेत्रों में उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजनाओं ने Apple और Samsung जैसे वैश्विक दिग्गजों को अपने विनिर्माण संचालन भारत में स्थानांतरित करने के लिए प्रोत्साहित किया है।

    अवसंरचना निवेश:

    सरकार ने कैपिटल एक्सपेंडिचर में ऐतिहासिक बढ़ोतरी की है—
    • हाईवे 30–40 किलोमीटर प्रतिदिन की दर से निर्माणाधीन हैं।
    • रेलवे प्रणाली का बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण हो रहा है।
    • UDAN योजना से हवाई कनेक्टिविटी दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँची है।

    डिजिटल अर्थव्यवस्था:

    2024 में डिजिटल अर्थव्यवस्था भारत के GDP में 12–13% योगदान दे रही है।
    यह संख्या 2029–30 तक बढ़कर 20% हो सकती है।

    B. सैन्य शक्ति: आयातक से निर्यातक बनने की दिशा में भारत

    Global Firepower Index 2025 के अनुसार भारत विश्व की चौथी सबसे शक्तिशाली सैन्य शक्ति है।
    लेकिन केवल रैंक ही नहीं, बल्कि सैन्य क्षमता का गुणात्मक परिवर्तन अधिक महत्वपूर्ण है।
    भारत का सैन्य सिद्धांत अब “defensive deterrence” से “proactive strategy” में विकसित हुआ है।
    और हथियार खरीद नीति “buy global” से “make global” हो रही है।

    1. रणनीतिक क्षमता और पूर्ण कार्यशील न्यूक्लियर ट्रायड

    भारत उन कुछ देशों में शामिल है जिनके पास पूर्णत: operational Nuclear Triad है—
    भूमि, वायु और समुद्र तीनों से परमाणु हथियार दागने की क्षमता।

    भूमि आधारित क्षमता:

    अग्नि श्रृंखला की मिसाइलें—Agni-V (5000+ km रेंज) एशिया के अधिकांश भाग और यूरोप के हिस्सों को कवर करती है।

    वायु आधारित क्षमता:

    Dassault Rafale और Sukhoi-30MKI विमानों को परमाणु-सक्षम डिलीवरी सिस्टम से लैस किया गया है।

    समुद्र आधारित क्षमता:

    INS Arihant-श्रेणी की परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियाँ भारत को “second-strike capability” प्रदान करती हैं।

    2. स्वदेशीकरण: रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत

    भारत रूस और पश्चिमी देशों पर रक्षा निर्भरता कम कर रहा है और पूर्ण रणनीतिक स्वायत्तता की दिशा में बढ़ रहा है।

    INS Vikrant:

    भारत का पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत—जो भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में लाता है जिनके पास ऐसा निर्माण कौशल है।

    Tejas MK-1A:

    4.5-जनरेशन का हल्का लड़ाकू विमान, जो पुराने MiG-21 बेड़े की जगह ले रहा है।

    LCH Prachand:

    विश्व का एकमात्र हमला-हेलीकॉप्टर जो 5000 मीटर ऊँचाई पर टेकऑफ़ और लैंडिंग कर सकता है—सियाचिन जैसे इलाकों में अत्यंत महत्वपूर्ण।

    रक्षा औद्योगिक गलियारे:

    UP और तमिलनाडु में बनाए गए रक्षा गलियारों ने MSMEs के लिए एक विशाल उत्पादन पारिस्थितिकी तंत्र तैयार किया है।

    3. रक्षा निर्यात: एक नया युग

    भारत, जो कभी दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक था, अब प्रमुख रक्षा निर्यातक बनने की ओर उभर रहा है।

    रिकॉर्ड निर्यात:

    2023–24 में भारत के रक्षा निर्यात ₹21,083 करोड़ ($2.6 बिलियन) तक पहुँच गए।
    2024–25 में भी यह रुझान बढ़ रहा है।

    मुख्य ग्राहक:

    • फिलीपींस – BrahMos मिसाइल

    • आर्मेनिया – तोपखाना प्रणाली

    • 85+ देश – विभिन्न रक्षा उपकरण

    4. हिंद महासागर क्षेत्र में “नेट सिक्योरिटी प्रदाता”

    भारत अब समुद्री क्षेत्र में अपनी सैन्य भूमिका को केंद्र में रख रहा है।

    Mission-Based Deployments:

    भारतीय नौसेना महत्वपूर्ण समुद्री chokepoints—जैसे मलक्का जलडमरूमध्य और होर्मुज़ जलडमरूमध्य—पर निरंतर उपस्थिति बनाए रखती है।

    मानवीय सहायता और आपदा प्रतिक्रिया:

    भारत क्षेत्रीय देशों के लिए “पहला प्रत्युत्तरकर्ता” है—
    मोज़ाम्बिक, मालदीव, श्रीलंका में राहत कार्य तथा लाल सागर–अरब सागर में एंटी-पायरेसी अभियान इसकी मिसाल हैं।

    निष्कर्ष

    भारत का “नेतृत्वकारी शक्ति” होने का दावा अब केवल आकांक्षात्मक नहीं, बल्कि वास्तविकता पर आधारित है।
    एक मज़बूत अर्थव्यवस्था—जो रक्षा क्षमताओं को वित्तीय आधार देती है—और एक सक्षम सैन्य शक्ति—जो आर्थिक हितों की रक्षा करती है—दोनों मिलकर एक सकारात्मक रणनीतिक चक्र (virtuous cycle) बना रही हैं।
    उच्च विदेशी मुद्रा भंडार और स्वदेशी रक्षा उत्पादन भारत को बाहरी झटकों से सुरक्षित रखते हैं और वैश्विक स्तर पर एक स्थिर, भरोसेमंद शक्ति के रूप में स्थापित कर रहे हैं।

  • भारत की भू-आर्थिक रणनीति

    🇮🇳 भारत की भू-आर्थिक रणनीति (India’s Geo-Economic Strategy)

    भूमिका:
    21वीं सदी में वैश्विक राजनीति का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। सैन्य शक्ति के साथ-साथ अब आर्थिक शक्ति—वैश्विक व्यापार, तकनीक, अवसंरचना, ऊर्जा और आपूर्ति-श्रृंखलाएँ—राष्ट्रों की रणनीतिक क्षमता को परिभाषित करती हैं। इसी बदले हुए परिदृश्य में भारत की भू-आर्थिक रणनीति उसकी विदेश नीति का केंद्रीय तत्व बनी है।

    1. व्यापार एवं वैश्विक बाज़ारों में भारत की रणनीति

    भारत अपने व्यापारिक संबंधों को बहुआयामी बनाकर एक मजबूत आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। पहले भारत सीमित देशों पर निर्भर था, परंतु अब उसने पश्चिम एशिया, अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और इंडो-पैसिफिक देशों के साथ व्यापार को विस्तार दिया है। UAE के साथ CEPA और ऑस्ट्रेलिया के साथ ECTA जैसे समझौते भारत को वैश्विक मूल्य-श्रृंखलाओं से अधिक मजबूती से जोड़ते हैं।
    PLI योजनाओं के माध्यम से भारत विनिर्माण का बड़ा केंद्र बन रहा है, जिससे निर्यात क्षमता बढ़ रही है और रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूती मिलती है।

    2. वैश्विक आपूर्ति-श्रृंखलाओं में भारत का उभार

    महामारी के बाद दुनिया को चीन पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम का अहसास हुआ। इस परिस्थिति में भारत “चीन-प्लस-वन” रणनीति का प्रमुख विकल्प बनकर उभरा है। Apple, Samsung जैसी कंपनियों का उत्पादन भारत में स्थानांतरित होना इसका प्रमाण है।
    IPEF जैसे ढांचे में भारत की भागीदारी supply chain security को मजबूत करती है।
    इसके साथ ही भारत लिथियम, कोबाल्ट, निकल जैसे critical minerals के लिए अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और लैटिन अमेरिका के साथ साझेदारी विकसित कर रहा है ताकि भविष्य के EV और semiconductor उद्योग सुरक्षित रह सकें।

    3. ऊर्जा सुरक्षा और भारत की भू-अर्थव्यवस्था

    भारत ऊर्जा आयात पर निर्भर है, इसलिए ऊर्जा सुरक्षा उसकी रणनीति का मुख्य आधार है। पश्चिम एशिया—सऊदी अरब, UAE, कतर—भारत के प्रमुख ऊर्जा साझेदार हैं।
    रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता दिखाते हुए सस्ता रूसी तेल खरीदा, जिससे ऊर्जा लागत कम हुई और आर्थिक स्थिरता बनी रही।

    नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में International Solar Alliance के माध्यम से भारत वैश्विक नेतृत्व स्थापित कर रहा है। 2030 तक 450 GW renewable क्षमता का लक्ष्य भारत को clean energy में विश्व-स्तरीय शक्ति बना सकता है।

    4. कनेक्टिविटी और अवसंरचना आधारित भू-अर्थशास्त्र

    वैश्विक प्रभाव उन देशों को मिलता है जिनका व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण होता है। इसी उद्देश्य से भारत ने IMEC (India-Middle East-Europe Economic Corridor) में प्रमुख भूमिका निभाई है, जो चीन की BRI का सशक्त विकल्प है।

    चाबहार बंदरगाह—भारत की मध्य एशिया तक पहुँच—पाकिस्तान को भू-राजनीतिक बाधा के रूप में बायपास करता है।
    INSTC (India-Iran-Russia Corridor) यूरोप तक तेज़ और सस्ता व्यापार मार्ग खोलता है।
    ये गलियारे भारत को वैश्विक सप्लाई मैप का केंद्र बना रहे हैं।

    5. तकनीकी भू-अर्थशास्त्र: भविष्य की शक्ति

    आज तकनीक ही आर्थिक और रणनीतिक शक्ति का मूल है। भारत semiconductor उद्योग विकसित कर रहा है और अमेरिका, जापान व ताइवान के साथ साझेदारी को मजबूत कर रहा है।
    डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर—UPI, आधार—विश्वभर में अपनाया जा रहा है, जिससे भारत की “डिजिटल कूटनीति” प्रभावशाली बन रही है।

    5G/6G नेटवर्क में सुरक्षित और विश्वसनीय तकनीक को प्राथमिकता देकर भारत ने अपनी तकनीकी संप्रभुता को मजबूत किया है।

    6. मुद्रा और वित्तीय भू-अर्थशास्त्र

    भारत अपनी आर्थिक स्वतंत्रता को बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रुपये के उपयोग को बढ़ावा दे रहा है। रूस, श्रीलंका और मॉरीशस जैसे देशों ने इसे स्वीकार किया है।
    G20 अध्यक्षता के दौरान भारत ने वैश्विक दक्षिण (Global South) के देशों की आवाज़ को मजबूत किया और ऋण सुधारों पर वैश्विक चर्चा को आगे बढ़ाया।

    7. प्रमुख चुनौतियाँ

    चीन की विशाल विनिर्माण क्षमता और आर्थिक प्रभुत्व भारत की प्रमुख चुनौती है।
    घरेलू अवसंरचना, skill development, logistics लागत और तकनीकी क्षमता में सुधार आवश्यक है।
    ऊर्जा निर्भरता और FTA वार्ताओं में घरेलू क्षेत्रों की चिंता भी संतुलित निर्णय मांगती है।

    निष्कर्ष:
    भारत की भू-अर्थशास्त्रीय रणनीति आर्थिक शक्ति, कूटनीति, तकनीक और अवसंरचना को एकीकृत करके बनाई गई व्यापक राष्ट्रीय रणनीति है।
    इसका लक्ष्य भारत को बहुध्रुवीय विश्व में एक स्वतंत्र, प्रभावशाली और स्थिर शक्ति के रूप में स्थापित करना है।
    भविष्य निश्चित रूप से भारत की भू-अर्थव्यवस्था के माध्यम से ही आकार लेगा।