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  • मैकियावली के धर्म और नैतिकता पर विचार तथा ‘द प्रिंस’ का राज्यदर्शन (Machiavelli on Religion, Morality and The Prince)

    1. धर्म पर विचार (Thoughts on Religion)

    मैकियावली मध्ययुग के पहले ऐसे विचारक थे जिन्होंने धर्म (Religion) को राजनीति के अधीन कर दिया। उनके लिए धर्म कोई ‘आध्यात्मिक सत्य’ नहीं, बल्कि ‘सामाजिक नियंत्रण’ का एक उपकरण (Tool) था।

    (A) धर्म का उपयोगितावादी दृष्टिकोण

    मैकियावली धर्म विरोधी नहीं थे, लेकिन वे धर्म को राजनीति के लिए उपयोगी मानते थे। उनका कहना था कि एक बुद्धिमान राजा को जनता को नियंत्रित करने और उन्हें कानून का पालन कराने के लिए धर्म का प्रयोग करना चाहिए।

    “जहां धर्म के प्रति भय नहीं होता, वहां राज्य का विनाश निश्चित है।”

    (B) ईसाई धर्म की आलोचना

    मैकियावली ने ईसाई धर्म (Christianity) की आलोचना की क्योंकि यह विनम्रता, त्याग और परलोक पर जोर देता है, जिससे नागरिक कायर और कमजोर बन जाते हैं। इसके विपरीत, उन्होंने प्राचीन रोमन धर्म की प्रशंसा की जो देशभक्ति, युद्ध और बलिदान को बढ़ावा देता था।


    2. नैतिकता और राजनीति (Separation of Morality and Politics)

    राजनीतिक चिंतन में मैकियावली का सबसे क्रांतिकारी कदम ‘नैतिकता’ की दोहरी परिभाषा (Dual Morality) देना था।

    (i) व्यक्तिगत नैतिकता (Private Morality): यह आम नागरिकों के लिए है। उन्हें सच बोलना चाहिए, दया करनी चाहिए और हत्या या चोरी नहीं करनी चाहिए।

    (ii) सार्वजनिक/राजनीतिक नैतिकता (Public Morality): यह राजा (Prince) के लिए है। राजा का एकमात्र नैतिक कर्तव्य है—राज्य की सुरक्षा और विस्तार। इस लक्ष्य को पाने के लिए किया गया कोई भी कार्य (चाहे वह हत्या, धोखा या विश्वासघात हो) ‘नैतिक’ माना जाएगा।

    साध्य ही साधन का औचित्य है (Ends Justify the Means)

    मैकियावली का स्पष्ट मत था कि यदि साध्य (Goal) श्रेष्ठ है—जैसे राज्य की सुरक्षा—तो उसे प्राप्त करने के लिए अपनाए गए साधन (Means) अपने आप पवित्र हो जाते हैं। राजा को परिणाम की चिंता करनी चाहिए, साधन की नहीं।


    3. ‘द प्रिंस’: राजा के लिए निर्देश (Ideas on The Prince)

    अपनी पुस्तक ‘द प्रिंस’ में मैकियावली ने एक सफल शासक के लिए आचरण संहिता (Code of Conduct) प्रस्तुत की है। उनका उद्देश्य एक ऐसे शक्तिशाली ‘प्रिंस’ का निर्माण करना था जो इटली का एकीकरण कर सके।

    प्रमुख विचार और निर्देश:

    • शक्ति का अर्जन: राजा का मुख्य कार्य शक्ति बढ़ाना है। उसे निरंतर युद्ध की तैयारी करनी चाहिए। “शांति काल में भी राजा को युद्ध के बारे में सोचना चाहिए।”
    • प्रेम से बेहतर है भय: राजा के लिए प्रजा का प्रेम सुरक्षित नहीं है, क्योंकि लोग स्वार्थ के लिए प्रेम भूल जाते हैं। लेकिन दंड का भय उन्हें वफादार रखता है। हालांकि, राजा को ‘घृणा’ (Hatred) से बचना चाहिए। उसे प्रजा की महिलाओं और संपत्ति को हाथ नहीं लगाना चाहिए।
    • राष्ट्रीय सेना: मैकियावली ने भाड़े के सैनिकों (Mercenaries) का घोर विरोध किया। उन्होंने कहा कि भाड़े के सैनिक या तो कायर होते हैं या महत्वाकांक्षी। राजा को अपनी ‘नागरिक सेना’ (National Army) बनानी चाहिए।
    • कानून और बल: राजा को कानून (मनुष्य का तरीका) और बल (जानवर का तरीका), दोनों का प्रयोग करना आना चाहिए।

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    4. शेर और लोमड़ी की नीति (Lion and Fox Policy)

    मैकियावली का सबसे प्रसिद्ध रूपक (Metaphor) राजा के गुणों से संबंधित है। उनका कहना था कि राजा को जानवरों के गुणों को अपनाना चाहिए।

    शेर (Lion) और लोमड़ी (Fox) का सिद्धांत:

    “राजा को ‘शेर’ होना चाहिए ताकि वह भेड़ियों (दुश्मनों) को डरा सके, और ‘लोमड़ी’ होना चाहिए ताकि वह जाल (साजिशों) को पहचान सके।”

    यदि राजा केवल शेर होगा, तो वह जाल में फंस जाएगा। यदि वह केवल लोमड़ी होगा, तो वह भेड़ियों से अपनी रक्षा नहीं कर पाएगा।

    अर्थात: राजा को बलवान और चालाक दोनों होना चाहिए। उसे ऊपर से दयालु और धार्मिक दिखना चाहिए, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर विश्वासघात करने में संकोच नहीं करना चाहिए।

    भाग्य (Fortuna) और पौरुष (Virtu)

    मैकियावली के अनुसार, राजनीति में 50% भूमिका भाग्य (Fortuna) की होती है और 50% राजा के कर्म/पौरुष (Virtu) की। उन्होंने भाग्य की तुलना एक ‘विनाशकारी नदी’ से की। एक बुद्धिमान राजा (पौरुष) बांध बनाकर उस नदी को नियंत्रित कर सकता है।


    5. निष्कर्ष

    मैकियावली ने ‘द प्रिंस’ में जिस शासन कला का वर्णन किया, वह नैतिकता की दृष्टि से भले ही निंदनीय लगे, लेकिन व्यावहारिक राजनीति (Realpolitik) की दृष्टि से आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने राजा को सिखाया कि राज्य को कैसे सुरक्षित रखा जाए। मैकियावली के विचार ही आधुनिक कूटनीति का आधार बने।

  • राज्य विधान परिषद: संरचना, सृजन और कार्य (State Legislative Council: Structure, Creation and Functions)

    1. परिचय (Introduction)

    राज्य विधानमंडल का ‘उच्च सदन’ (Upper House) विधान परिषद (Legislative Council) कहलाता है। राज्यसभा की तरह ही यह राज्यों में बड़ों का सदन है। यह सभी राज्यों में अनिवार्य नहीं है। वर्तमान में भारत के केवल 6 राज्यों में द्विसदनीय व्यवस्था (विधान परिषद) है:

    वर्तमान में विधान परिषद वाले राज्य:

    1. उत्तर प्रदेश
    2. बिहार
    3. महाराष्ट्र
    4. कर्नाटक
    5. आंध्र प्रदेश
    6. तेलंगाना

    2. सृजन और समाप्ति (Creation and Abolition) – अनुच्छेद 169

    संविधान का अनुच्छेद 169 संसद को किसी राज्य में विधान परिषद को बनाने (Srisjan) या समाप्त (Utsadan) करने का अधिकार देता है।

    प्रक्रिया: यदि संबंधित राज्य की विधानसभा अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत (विशेष बहुमत) से इस आशय का प्रस्ताव पारित कर दे, तो संसद साधारण बहुमत से विधान परिषद का गठन या समाप्ति कर सकती है।


    3. विधान परिषद की संरचना (Composition) – अनुच्छेद 171

    विधान परिषद के सदस्यों की संख्या उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के एक-तिहाई (1/3) से अधिक नहीं होगी, परंतु किसी भी दशा में 40 से कम नहीं होगी।

    सदस्यों का निर्वाचन (Election of Members)

    इसके सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से ‘आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति’ के द्वारा होता है। चुनाव विभिन्न निर्वाचक मंडलों द्वारा किया जाता है:

    अनुपात कौन चुनता है?
    1/3 सदस्य राज्य की विधानसभा के सदस्यों (MLAs) द्वारा।
    1/3 सदस्य स्थानीय निकायों (नगर पालिका, जिला बोर्ड आदि) द्वारा।
    1/12 सदस्य स्नातकों (Graduates) द्वारा (जो 3 वर्ष पहले स्नातक कर चुके हों)।
    1/12 सदस्य शिक्षकों द्वारा (जो 3 वर्ष से माध्यमिक स्कूलों या उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ा रहे हों)।
    1/6 सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत (साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता और समाज सेवा के क्षेत्र से)।

    4. योग्यता एवं कार्यकाल

    • आयु: सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष होनी चाहिए।
    • कार्यकाल: यह एक स्थायी सदन है, इसका विघटन नहीं होता। सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष होता है। प्रति दो वर्ष में एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त हो जाते हैं।

    5. कार्य एवं शक्तियां (Functions and Powers)

    संविधान में विधान परिषद को विधानसभा की तुलना में बहुत कम शक्तियां दी गई हैं। इसकी स्थिति ‘सलाहकारी’ अधिक है।

    1. विधायी शक्तियां (Legislative Powers)

    साधारण विधेयक विधान परिषद में पेश किया जा सकता है। लेकिन यदि विधानसभा ने किसी विधेयक को पारित कर दिया है, तो परिषद उसे केवल रोक सकती है (Delay):

    • पहली बार में: 3 महीने तक।
    • दूसरी बार (यदि विधानसभा दोबारा पास कर दे): 1 महीने तक।
    • कुल देरी: अधिकतम 4 महीने। विधान परिषद किसी विधेयक को समाप्त नहीं कर सकती।

    2. वित्तीय शक्तियां (Financial Powers)

    धन विधेयक (Money Bill) केवल विधानसभा में पेश होता है। विधान परिषद इसे न तो अस्वीकार कर सकती है और न ही इसमें संशोधन कर सकती है। वह इसे केवल 14 दिनों तक रोक सकती है।

    6. निष्कर्ष

    आलोचक विधान परिषद को ‘सफेद हाथी’ या खर्चीली संस्था कहते हैं, लेकिन इसका महत्व इस बात में है कि यह विशेषज्ञों और बुद्धिजीवियों को (जो प्रत्यक्ष चुनाव नहीं लड़ना चाहते) विधायिका में स्थान देती है और जल्दबाजी में बनाए गए कानूनों पर पुनर्विचार का अवसर प्रदान करती है।

  • विधान सभा: संरचना, चुनाव प्रक्रिया और शक्तियां (Legislative Assembly: Structure, Election and Powers)

    1. परिचय (Introduction)

    राज्य विधानमंडल (State Legislature) के ‘निम्न सदन’ (Lower House) को विधान सभा (Legislative Assembly) कहा जाता है। यह जनता का प्रतिनिधित्व करने वाला सदन है और राज्य की राजनीति में इसका स्थान केंद्रीय स्तर पर लोकसभा के समान ही प्रभावशाली है। संविधान के अनुच्छेद 170 में विधान सभाओं की संरचना का वर्णन किया गया है।


    2. विधान सभा की संरचना (Structure/Composition)

    विधान सभा के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से राज्य की जनता द्वारा चुने जाते हैं। इनकी संख्या राज्य की जनसंख्या पर निर्भर करती है।

    (A) सदस्य संख्या (Number of Members)

    • अधिकतम (Maximum): किसी भी राज्य की विधान सभा में सदस्यों की संख्या 500 से अधिक नहीं हो सकती।
    • न्यूनतम (Minimum): सदस्यों की संख्या 60 से कम नहीं होनी चाहिए।
    अपवाद (Exceptions): कुछ छोटे राज्यों में सदस्य संख्या 60 से कम है, जिसे विशेष प्रावधानों द्वारा अनुमति दी गई है। जैसे- सिक्किम (32), गोवा (40), और मिजोरम (40)।

    (B) आरक्षण (Reservation)

    अनुच्छेद 332 के तहत राज्य की जनसंख्या के अनुपात में अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए सीटें आरक्षित की जाती हैं।


    3. सदस्यों की योग्यता एवं कार्यकाल

    (A) योग्यताएं (Qualifications) – अनुच्छेद 173

    विधान सभा का सदस्य (MLA) बनने के लिए व्यक्ति में निम्नलिखित योग्यताएं होनी चाहिए:

    • वह भारत का नागरिक हो।
    • उसकी आयु कम से कम 25 वर्ष हो।
    • वह संसद द्वारा निर्धारित अन्य सभी योग्यताएं रखता हो।
    • वह पागल या दिवालिया न हो और लाभ के पद पर न हो।

    (B) कार्यकाल (Tenure) – अनुच्छेद 172

    विधान सभा का सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।

    परंतु:

    • मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल इसे समय से पूर्व भी भंग (Dissolve) कर सकता है।
    • राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency) के दौरान संसद इसके कार्यकाल को एक बार में एक वर्ष के लिए बढ़ा सकती है।

    4. विधान सभा के कार्य एवं शक्तियां

    विधान सभा को विधान परिषद (जहाँ मौजूद है) की तुलना में बहुत अधिक शक्तियां प्राप्त हैं:

    1. विधायी शक्तियां (Legislative Powers)

    विधान सभा राज्य सूची (State List) और समवर्ती सूची (Concurrent List) के विषयों पर कानून बना सकती है। साधारण विधेयक किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है, लेकिन अंतिम शक्ति विधान सभा के पास ही होती है।

    2. वित्तीय शक्तियां (Financial Powers)

    वित्तीय मामलों में विधान सभा सर्वोच्च है।

    • धन विधेयक (Money Bill): यह केवल विधान सभा में ही पेश किया जा सकता है। विधान परिषद इसे मात्र 14 दिन रोक सकती है।
    • बजट: राज्य के बजट पर नियंत्रण विधान सभा का ही होता है।

    3. कार्यपालिका पर नियंत्रण

    राज्य की मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधान सभा के प्रति उत्तरदायी होती है (अनुच्छेद 164)। यदि विधान सभा अविश्वास प्रस्ताव (No Confidence Motion) पारित कर दे, तो सरकार को इस्तीफा देना पड़ता है।

    4. निर्वाचन संबंधी शक्तियां

    विधान सभा के निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेते हैं। साथ ही, वे राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव भी करते हैं।


    5. निष्कर्ष (Conclusion)

    संक्षेप में, विधान सभा राज्य की जन-आकांक्षाओं का केंद्र है। यह न केवल कानून बनाती है बल्कि राज्य सरकार पर अंकुश भी रखती है। लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण में विधान सभा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

  • संसद की विधायी प्रक्रिया: विधेयक से अधिनियम बनने का सफर (Legislative Process of Parliament: From Bill to Act)

    1. परिचय: विधेयक क्या है?

    संसद का प्राथमिक कार्य देश के लिए कानून बनाना है। कानून बनाने की प्रक्रिया एक प्रस्ताव से शुरू होती है जिसे ‘विधेयक’ (Bill) कहा जाता है। जब यह विधेयक संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) द्वारा पारित हो जाता है और राष्ट्रपति उस पर अपनी स्वीकृति दे देते हैं, तब वह ‘अधिनियम’ (Act) या कानून बन जाता है।

    अनुच्छेद 107 में विधेयकों को पुरःस्थापित (Introduce) करने और पारित करने के उपबंध दिए गए हैं।


    2. विधेयकों का वर्गीकरण (Types of Bills)

    भारतीय संसद में प्रस्तुत किए जाने वाले विधेयकों को मुख्य रूप से चार श्रेणियों में बांटा जा सकता है:

    • 1. साधारण विधेयक (Ordinary Bill): वित्तीय विषयों के अलावा अन्य सभी मामलों से संबंधित (अनुच्छेद 107)।
    • 2. धन विधेयक (Money Bill): कराधान, सरकारी खर्च और ऋण आदि से संबंधित (अनुच्छेद 110)।
    • 3. वित्त विधेयक (Financial Bill): वित्तीय मामलों से संबंधित (अनुच्छेद 117)।
    • 4. संविधान संशोधन विधेयक: संविधान के प्रावधानों में बदलाव के लिए (अनुच्छेद 368)।

    3. कानून बनने के चरण (Stages of Law Making)

    एक साधारण विधेयक को अधिनियम बनने के लिए प्रत्येक सदन में तीन वाचनों (Readings) से गुजरना पड़ता है:

    (A) प्रथम वाचन (First Reading)

    इस चरण में विधेयक को सदन में प्रस्तुत (Introduce) किया जाता है। मंत्री या सदस्य सदन की अनुमति मांगता है। इस स्तर पर कोई चर्चा नहीं होती। विधेयक को भारत के राजपत्र (Gazette) में प्रकाशित किया जाता है।

    (B) द्वितीय वाचन (Second Reading)

    यह सबसे महत्वपूर्ण और विस्तृत चरण है। इसमें विधेयक की धारावार (Clause-by-clause) समीक्षा होती है। इसके तीन उप-चरण होते हैं:

    • साधारण बहस: विधेयक के मूल सिद्धांतों पर चर्चा होती है।
    • समिति अवस्था (Committee Stage): विधेयक को प्रवर समिति (Select Committee) के पास सूक्ष्म जांच के लिए भेजा जाता है।
    • विचार अवस्था: समिति की रिपोर्ट पर सदन में चर्चा होती है और सदस्य संशोधन प्रस्ताव रख सकते हैं।

    (C) तृतीय वाचन (Third Reading)

    इस चरण में विधेयक पर केवल ‘संपूर्ण रूप से’ चर्चा होती है। कोई संशोधन नहीं किया जा सकता। विधेयक को या तो स्वीकार किया जाता है या अस्वीकार। यदि बहुमत इसे पास कर देता है, तो इसे पीठासीन अधिकारी द्वारा प्रमाणित करके दूसरे सदन में भेज दिया जाता है।

    (D) दूसरे सदन में विधेयक

    दूसरे सदन में भी विधेयक इन्हीं तीन चरणों से गुजरता है। दूसरा सदन:

    • विधेयक को बिना संशोधन के पारित कर सकता है।
    • कुछ संशोधनों के साथ वापस भेज सकता है।
    • विधेयक को अस्वीकार कर सकता है।
    • विधेयक पर कोई कार्यवाही नहीं करता (6 महीने तक लंबित रखना)।

    4. संयुक्त अधिवेशन (Joint Sitting) – अनुच्छेद 108

    यदि किसी साधारण विधेयक पर दोनों सदनों में गतिरोध (Deadlock) उत्पन्न हो जाए (जैसे- दूसरा सदन विधेयक को अस्वीकार कर दे या 6 महीने से अधिक समय बीत जाए), तो राष्ट्रपति दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुला सकते हैं।

    महत्वपूर्ण तथ्य:

    • संयुक्त अधिवेशन केवल साधारण विधेयकों पर बुलाया जा सकता है (धन विधेयक या संविधान संशोधन पर नहीं)।
    • इसकी अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करता है।
    • निर्णय उपस्थित सदस्यों के बहुमत से लिया जाता है।

    5. राष्ट्रपति की स्वीकृति (Assent to Bill) – अनुच्छेद 111

    दोनों सदनों से पारित होने के बाद विधेयक राष्ट्रपति के पास जाता है। अनुच्छेद 111 के तहत राष्ट्रपति के पास तीन विकल्प होते हैं:

    1. वह विधेयक को स्वीकृति दे देते हैं (विधेयक कानून बन जाता है)।
    2. वह स्वीकृति सुरक्षित रख लेते हैं (विधेयक समाप्त हो जाता है)।
    3. वह विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा देते हैं (यदि वह धन विधेयक नहीं है)। यदि संसद इसे दोबारा (संशोधन के साथ या बिना) पारित कर देती है, तो राष्ट्रपति को स्वीकृति देनी ही पड़ती है।

    इस प्रकार, भारतीय संसद की विधायी प्रक्रिया अत्यंत व्यापक और व्यवस्थित है, जो यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी कानून जल्दबाजी में न बनाया जाए।

  • लोकसभा अध्यक्ष: भूमिका, शक्तियां, कार्य एवं स्वतंत्रता (Lok Sabha Speaker: Powers, Functions and Independence)

    1. परिचय एवं चुनाव (Introduction & Election)

    लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) भारतीय संसद के निचले सदन का पीठासीन अधिकारी होता है। संसदीय लोकतंत्र में अध्यक्ष का पद अत्यंत सम्मान, गरिमा और अधिकार का माना जाता है। वह सदन का संवैधानिक और औपचारिक प्रमुख होता है।

    संवैधानिक प्रावधान (अनुच्छेद 93): संविधान के अनुच्छेद 93 के अनुसार, लोकसभा अपनी पहली बैठक के पश्चात यथाशीघ्र अपने दो सदस्यों को क्रमशः ‘अध्यक्ष’ और ‘उपाध्यक्ष’ के रूप में चुनेगी।

    • चुनाव: अध्यक्ष का चुनाव लोकसभा के सदस्यों द्वारा अपने ही बीच से किया जाता है। चुनाव की तारीख राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती है।
    • कार्यकाल: सामान्यतः अध्यक्ष का कार्यकाल लोकसभा के जीवनकाल (5 वर्ष) तक होता है। हालांकि, नई लोकसभा के गठन के बाद पहली बैठक तक वह अपने पद पर बना रहता है।

    2. अध्यक्ष की भूमिका, शक्तियां एवं कार्य (Role, Powers and Functions)

    लोकसभा अध्यक्ष की शक्तियां व्यापक हैं, जिन्हें संविधान, लोकसभा की प्रक्रिया के नियमों और संसदीय परंपराओं से प्राप्त किया गया है। उनके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:

    सदन की कार्यवाही का संचालन (Conduct of Business)

    अध्यक्ष का प्राथमिक कार्य सदन की बैठकों का संचालन करना है। वह यह सुनिश्चित करता है कि कार्यवाही सुचारू रूप से चले। वह सदन के नियमों की व्याख्या करता है, और उसकी व्याख्या अंतिम मानी जाती है। कोरम (गणपूर्ति) के अभाव में (कुल सदस्यों का 1/10) वह सदन की कार्यवाही को स्थगित कर सकता है।

    अनुशासन और गरिमा बनाए रखना (Discipline and Decorum)

    सदन में व्यवस्था बनाए रखने की अंतिम जिम्मेदारी अध्यक्ष की होती है। यदि कोई सदस्य नियमों का उल्लंघन करता है या सदन की कार्यवाही में बाधा डालता है, तो अध्यक्ष उसे नाम लेकर चेतावनी दे सकता है या सदन से बाहर जाने का आदेश दे सकता है। गंभीर मामलों में वह सदस्य को निलंबित भी कर सकता है।

    संसदीय समितियों पर नियंत्रण (Control over Committees)

    अध्यक्ष लोकसभा की सभी संसदीय समितियों के कामकाज का पर्यवेक्षण करता है। वह समितियों के अध्यक्षों (Chairpersons) की नियुक्ति करता है। वह स्वयं ‘कार्य मंत्रणा समिति’ (Business Advisory Committee), ‘नियम समिति’ और ‘सामान्य प्रयोजन समिति’ का अध्यक्ष होता है।


    3. अध्यक्ष की विशेष शक्तियां (Special Powers)

    (i) धन विधेयक का प्रमाणीकरण (Money Bill Certification)

    अनुच्छेद 110 के तहत, कोई विधेयक ‘धन विधेयक’ (Money Bill) है या नहीं, इसका निर्णय करने का अंतिम अधिकार लोकसभा अध्यक्ष के पास है। उनके इस निर्णय को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।

    (ii) संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता (Presiding over Joint Sitting)

    अनुच्छेद 108 के तहत, यदि किसी साधारण विधेयक पर दोनों सदनों में गतिरोध हो जाए, तो राष्ट्रपति संयुक्त अधिवेशन (Joint Sitting) बुलाता है। इस संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करता है (न कि उपराष्ट्रपति/राज्यसभा सभापति)।

    (iii) दलबदल कानून के तहत अयोग्यता (Disqualification under Defection)

    संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत, दलबदल (Anti-defection) के आधार पर किसी सदस्य की अयोग्यता का निर्णय अध्यक्ष करता है। (हालांकि, किहोटो होलोहन मामले (1992) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अध्यक्ष का यह निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन है)।


    4. अध्यक्ष की स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता (Independence and Impartiality)

    संसदीय लोकतंत्र की सफलता के लिए यह अनिवार्य है कि अध्यक्ष निष्पक्ष हो। वह किसी दल का नहीं, बल्कि पूरे सदन का प्रतिनिधि होता है। संविधान में उनकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित विशेष प्रावधान किए गए हैं:

    (1) कार्यकाल की सुरक्षा (Security of Tenure)

    अध्यक्ष को पद से हटाना आसान नहीं है। उसे अनुच्छेद 94 के तहत केवल लोकसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत (Effective Majority) से पारित संकल्प द्वारा ही हटाया जा सकता है। ऐसा प्रस्ताव लाने से 14 दिन पूर्व सूचना देना अनिवार्य है।

    (2) वेतन और भत्ते (Salary and Allowances)

    अध्यक्ष के वेतन और भत्ते संसद द्वारा निर्धारित किए जाते हैं और वे भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) पर भारित होते हैं। इसका अर्थ है कि उन पर संसद में मतदान नहीं हो सकता, केवल चर्चा हो सकती है।

    (3) निर्णायक मत (Casting Vote) – अनुच्छेद 100

    निष्पक्षता बनाए रखने के लिए अध्यक्ष सामान्य स्थिति में सदन में मतदान नहीं करता। लेकिन, यदि किसी मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के मत बराबर (Tie) हो जाएं, तो वह ‘निर्णायक मत’ (Casting Vote) का प्रयोग करता है ताकि गतिरोध को समाप्त किया जा सके।

    (4) वरीयता क्रम में उच्च स्थान

    वरीयता क्रम (Warrant of Precedence) में अध्यक्ष का स्थान बहुत ऊंचा (7वां स्थान) है। वह भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के बराबर और कैबिनेट मंत्रियों से ऊपर होता है। यह पद की महत्ता को दर्शाता है।


    5. निष्कर्ष (Conclusion)

    पंडित नेहरू ने कहा था, “अध्यक्ष सदन की गरिमा, और उसकी स्वतंत्रता का प्रतिनिधित्व करता है।” लोकसभा अध्यक्ष भारतीय संसद की धुरी है। यद्यपि वह एक राजनीतिक दल के टिकट पर चुनाव जीतता है, लेकिन अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठने के बाद उससे पूर्ण तटस्थता (Neutrality) और निष्पक्षता की अपेक्षा की जाती है ताकि संसदीय लोकतंत्र सुदृढ़ बना रहे।

  • भारतीय संसद: लोकसभा और राज्यसभा की संरचना एवं कार्य (Structure and Functions of Lok Sabha and Rajya Sabha)

    1. परिचय (Introduction)

    भारतीय संविधान के भाग 5 (Part V) में अनुच्छेद 79 से 122 तक संसद के गठन, संरचना, अवधि, अधिकारियों, प्रक्रियाओं और शक्तियों का वर्णन किया गया है। भारत में ब्रिटेन के संविधान से प्रेरित ‘वेस्टमिंस्टर मॉडल’ पर आधारित संसदीय शासन प्रणाली अपनाई गई है।

    📜 अनुच्छेद 79 (Article 79): संघ के लिए एक संसद होगी जो तीन अंगों से मिलकर बनेगी:

    • राष्ट्रपति (President): संसद का अभिन्न अंग है।
    • राज्यसभा (Rajya Sabha): उच्च सदन / राज्यों की परिषद।
    • लोकसभा (Lok Sabha): निम्न सदन / जनता का सदन।

    2. राज्यसभा: संरचना और कार्य (Rajya Sabha)

    राज्यसभा संसद का उच्च सदन (Upper House) है जो भारतीय संघ के राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करता है। यह एक स्थायी सदन है जिसका कभी विघटन (Dissolution) नहीं होता।

    (A) संरचना (Composition) – अनुच्छेद 80

    संविधान के अनुच्छेद 80 के अनुसार, राज्यसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 250 निर्धारित की गई है:

    • 238 सदस्य: राज्यों और संघ शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि होते हैं (अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित)।
    • 12 सदस्य: राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत (Nominated) किए जाते हैं। (साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा के क्षेत्र से)।

    वर्तमान स्थिति: वर्तमान में राज्यसभा में 245 सदस्य हैं (229 राज्यों से + 4 केंद्रशासित प्रदेशों से + 12 मनोनीत)।

    (B) निर्वाचन और कार्यकाल

    • चुनाव पद्धति: आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) द्वारा।
    • कार्यकाल: सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष होता है। प्रत्येक दो वर्ष बाद इसके एक-तिहाई (1/3) सदस्य सेवानिवृत्त हो जाते हैं।

    (C) राज्यसभा की विशेष शक्तियां

    संघीय ढांचे को मजबूत करने के लिए राज्यसभा के पास दो अनन्य शक्तियां हैं:

    1. अनुच्छेद 249: राज्य सूची के विषय पर कानून बनाने के लिए संसद को अधिकृत करना।
    2. अनुच्छेद 312: नई ‘अखिल भारतीय सेवाओं’ (All India Services) का सृजन करना।

    3. लोकसभा: संरचना और कार्य (Lok Sabha)

    लोकसभा संसद का निम्न सदन (Lower House) है और यह भारत के लोगों का सीधे प्रतिनिधित्व करता है। सरकार के गठन में इसकी भूमिका निर्णायक होती है।

    (A) संरचना (Composition) – अनुच्छेद 81

    लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 550 हो सकती है। (104वें संविधान संशोधन, 2019 द्वारा एंग्लो-इंडियन सदस्यों का मनोनयन समाप्त कर दिया गया)।

    • 530 सदस्य: राज्यों के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से।
    • 20 सदस्य: केंद्रशासित प्रदेशों से।

    वर्तमान स्थिति: वर्तमान में लोकसभा में 543 सदस्य हैं।

    (B) निर्वाचन और कार्यकाल

    • चुनाव: प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा ‘सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार’ (18 वर्ष से अधिक) के आधार पर।
    • कार्यकाल: सामान्यतः 5 वर्ष। प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति इसे समय से पूर्व भंग कर सकता है।

    4. संसद के प्रमुख कार्य एवं शक्तियां

    संसद केवल कानून बनाने वाली संस्था नहीं है, बल्कि इसके पास बहुआयामी शक्तियां हैं:

    1. विधायी शक्तियां (Legislative Powers)

    संसद संघ सूची (Union List) और समवर्ती सूची (Concurrent List) के विषयों पर कानून बनाती है। साधारण विधेयक किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है।

    2. वित्तीय शक्तियां (Financial Powers)

    संसद ‘राष्ट्रीय वित्त’ की संरक्षक है।

    • बजट: संसद की मंजूरी के बिना सरकार एक रुपया भी खर्च नहीं कर सकती।
    • धन विधेयक (Money Bill): अनुच्छेद 110 के तहत धन विधेयक केवल लोकसभा में पेश किया जा सकता है। राज्यसभा के पास इसमें सीमित शक्तियां हैं (मात्र 14 दिन की देरी)।

    3. कार्यपालिका पर नियंत्रण (Control over Executive)

    संसदीय प्रणाली में मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है। संसद प्रश्नकाल (Question Hour), शून्यकाल (Zero Hour) और अविश्वास प्रस्ताव (No Confidence Motion) के माध्यम से सरकार पर नियंत्रण रखती है।

    4. संविधान संशोधन (Constitutional Amendment)

    अनुच्छेद 368 के तहत संसद संविधान के प्रावधानों में संशोधन कर सकती है। इसके लिए दोनों सदनों के विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है।


    5. निष्कर्ष (Conclusion)

    भारतीय संसद देश की संप्रभुता और जनइच्छा का प्रतीक है। जहाँ लोकसभा जनता की भावनाओं का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करती है और सरकार बनाती है, वहीं राज्यसभा राज्यों के हितों की रक्षा करती है और जल्दबाजी में बनाए गए कानूनों पर रोक (Check and Balance) लगाती है। दोनों सदन मिलकर भारतीय लोकतंत्र को सशक्त बनाते हैं।

  • राज्य कार्यपालिका: मुख्यमंत्री के कार्य एवं शक्तियां (Chief Minister: Powers and Functions in Hindi)

    2.2. मुख्यमंत्री: कार्य एवं शक्तियां (Chief Minister: Functions and Powers)

    संसदीय शासन व्यवस्था में राज्य के प्रशासन में मुख्यमंत्री (Chief Minister) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। जहां राज्यपाल राज्य का ‘नाममात्र का कार्यकारी प्रमुख’ (De jure executive) होता है, वहीं मुख्यमंत्री राज्य का ‘वास्तविक कार्यकारी प्रमुख’ (De facto executive) होता है। वह राज्य सरकार का मुखिया होता है।

    संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provisions)

    • अनुच्छेद 163: राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होगा।
    • अनुच्छेद 164: मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाएगी। अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल, मुख्यमंत्री की सलाह पर करेगा।
    • अनुच्छेद 167: यह मुख्यमंत्री का कर्तव्य है कि वह राज्य के प्रशासन और विधायी प्रस्तावों से संबंधित जानकारी राज्यपाल को दे।

    मुख्यमंत्री की शक्तियां और कार्य (Powers and Functions)

    मुख्यमंत्री की शक्तियों को उनके विभिन्न संबंधों के आधार पर निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:

    1. मंत्रिपरिषद के संबंध में (In relation to Council of Ministers)

    मुख्यमंत्री राज्य मंत्रिपरिषद का निर्माता और प्रमुख होता है।

    • मंत्रियों की नियुक्ति की सिफारिश: राज्यपाल केवल उन्हीं व्यक्तियों को मंत्री नियुक्त करता है जिनकी सिफारिश मुख्यमंत्री करते हैं।
    • विभागों का आवंटन: वह मंत्रियों के बीच विभागों (Portfolios) का वितरण और फेरबदल करता है।
    • बैठकों की अध्यक्षता: वह मंत्रिपरिषद की बैठकों की अध्यक्षता करता है और निर्णयों को प्रभावित करता है।
    • सामूहिक उत्तरदायित्व: यदि मुख्यमंत्री त्यागपत्र दे देता है, तो पूरी मंत्रिपरिषद अपने आप विघटित (Collapse) हो जाती है।

    2. राज्यपाल के संबंध में (In relation to the Governor)

    मुख्यमंत्री राज्यपाल और मंत्रिपरिषद के बीच संवाद की मुख्य कड़ी (Main Channel of Communication) होता है (अनुच्छेद 167)।

    • वह राज्य के प्रशासन और विधान से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी निर्णयों की सूचना राज्यपाल को देता है।
    • वह महत्वपूर्ण नियुक्तियों (जैसे- राज्य महाधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्य) के संबंध में राज्यपाल को सलाह देता है।

    3. राज्य विधानमंडल के संबंध में (In relation to State Legislature)

    सदन का नेता (Leader of the House) होने के नाते, मुख्यमंत्री के पास निम्नलिखित शक्तियां होती हैं:

    • वह राज्यपाल को विधानसभा का सत्र बुलाने या स्थगित करने की सलाह देता है।
    • वह किसी भी समय राज्यपाल से विधानसभा को भंग (Dissolve) करने की सिफारिश कर सकता है।
    • वह सदन के पटल पर सरकार की नीतियों की घोषणा करता है।

    4. अन्य शक्तियां और कार्य (Other Powers and Functions)

    • राज्य योजना बोर्ड: वह राज्य योजना बोर्ड (State Planning Board) का अध्यक्ष होता है।
    • क्षेत्रीय परिषद: वह संबंधित क्षेत्रीय परिषद (Zonal Council) के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य करता है (क्रमवार एक वर्ष के लिए)।
    • आपात्काल: आपातकाल के दौरान वह मुख्य प्रबंधक (Crisis Manager) के रूप में कार्य करता है।
    • वह राज्य की जनता की शिकायतों को सुनता है और उनका निवारण करता है।

    महत्वपूर्ण तथ्य (Key Facts)

    नोट: मुख्यमंत्री का कार्यकाल निश्चित नहीं होता है। वह राज्यपाल के ‘प्रसादपर्यंत’ पद धारण करता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि राज्यपाल उसे कभी भी हटा सकता है। जब तक मुख्यमंत्री को विधानसभा में बहुमत प्राप्त है, उसे पद से नहीं हटाया जा सकता।

    निष्कर्षतः, मुख्यमंत्री राज्य प्रशासन का सबसे शक्तिशाली पदाधिकारी होता है। उसकी स्थिति, क्षमता और व्यक्तित्व पर ही राज्य का सुशासन निर्भर करता है।

  • राज्यपाल

    2.1. राज्यपाल: कार्य एवं शक्तियां (Governor: Functions and Powers)

    भारतीय संविधान के भाग 6 (Part VI) में अनुच्छेद 153 से 167 तक राज्य कार्यपालिका का वर्णन किया गया है। राज्यपाल (Governor) राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है और केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में भी कार्य करता है। राज्य का समस्त प्रशासन राज्यपाल के नाम से ही चलाया जाता है।

    संवैधानिक स्थिति (Constitutional Position)

    अनुच्छेद 153: प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा। (परंतु 7वें संविधान संशोधन, 1956 के द्वारा एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है)।

    अनुच्छेद 154: राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी, जिसका प्रयोग वह स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करेगा।


    राज्यपाल की शक्तियां और कार्य (Powers and Functions of Governor)

    राज्यपाल की शक्तियों को मुख्य रूप से चार श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है: कार्यकारी, विधायी, वित्तीय और न्यायिक शक्तियां।

    1. कार्यकारी शक्तियां (Executive Powers)

    राज्यपाल राज्य कार्यपालिका का प्रधान होता है। कार्यकारी शक्तियों के अंतर्गत निम्नलिखित कार्य आते हैं:

    • नियुक्तियां: राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है और मुख्यमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है (अनुच्छेद 164)।
    • वह राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) की नियुक्ति करता है और उसका कार्यकाल व वेतन निर्धारित करता है।
    • वह राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति करता है (हालांकि, उन्हें केवल राष्ट्रपति द्वारा ही हटाया जा सकता है)।
    • अनुच्छेद 356: यदि राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाता है, तो राज्यपाल राष्ट्रपति से राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर सकता है। राष्ट्रपति शासन के दौरान, राज्यपाल केंद्र के एजेंट के रूप में कार्यकारी शक्तियों का प्रयोग करता है।
    • वह राज्य के विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति (Chancellor) होता है और कुलपतियों (Vice-Chancellors) की नियुक्ति करता है।

    2. विधायी शक्तियां (Legislative Powers)

    राज्यपाल राज्य विधानमंडल का एक अभिन्न अंग होता है (अनुच्छेद 168)। उसकी विधायी शक्तियां व्यापक हैं:

    • सत्र बुलाना और भंग करना: राज्यपाल राज्य विधानमंडल के सत्र को आहूत (Summon) और सत्रावसान (Prorogue) कर सकता है तथा राज्य विधानसभा को भंग (Dissolve) कर सकता है (अनुच्छेद 174)।
    • संबोधन: प्रत्येक आम चुनाव के बाद पहले सत्र और प्रत्येक वर्ष के पहले सत्र में वह विधानमंडल को संबोधित करता है (अनुच्छेद 176)।
    • विधेयक पर सहमति (अनुच्छेद 200): जब कोई विधेयक विधानमंडल द्वारा पास होकर राज्यपाल के पास आता है, तो वह:
      • विधेयक को स्वीकृति दे सकता है।
      • स्वीकृति रोक सकता है।
      • विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है (धन विधेयक को छोड़कर)।
      • विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित कर सकता है (अनुच्छेद 201)।
    • अध्यादेश जारी करना (अनुच्छेद 213): जब विधानमंडल का सत्र नहीं चल रहा हो और किसी कानून की तत्काल आवश्यकता हो, तो राज्यपाल अध्यादेश (Ordinance) जारी कर सकता है। यह अध्यादेश 6 सप्ताह के भीतर विधानमंडल द्वारा अनुमोदित होना आवश्यक है।

    3. वित्तीय शक्तियां (Financial Powers)

    • धन विधेयक (Money Bill): राज्य विधानसभा में धन विधेयक केवल राज्यपाल की पूर्व अनुमति से ही पेश किया जा सकता है।
    • बजट: वह सुनिश्चित करता है कि ‘वार्षिक वित्तीय विवरण’ (राज्य बजट) विधानमंडल के समक्ष रखा जाए (अनुच्छेद 202)।
    • अनुदान की मांग: कोई भी अनुदान की मांग राज्यपाल की सिफारिश के बिना नहीं की जा सकती।
    • आकस्मिकता निधि: किसी अप्रत्याशित व्यय को पूरा करने के लिए वह ‘राज्य की आकस्मिकता निधि’ (Contingency Fund) से अग्रिम धन दे सकता है।
    • वह राज्य वित्त आयोग का गठन करता है जो पंचायतों और नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करता है।

    4. न्यायिक शक्तियां (Judicial Powers)

    अनुच्छेद 161 के तहत, राज्यपाल को क्षमादान की शक्ति प्राप्त है। वह राज्य विधि के तहत किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति की सजा को:

    • क्षमा (Pardon) कर सकता है।
    • प्रविलंबन (Reprieve) कर सकता है।
    • विराम (Respite) या परिहार (Remission) कर सकता है।

    नोट: राज्यपाल मृत्युदंड (Death Sentence) को पूरी तरह माफ नहीं कर सकता (यह शक्ति केवल राष्ट्रपति के पास है) और न ही वह कोर्ट मार्शल (सेन्य न्यायालय) के मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है।

    5. विवेकाधिकार शक्तियां (Discretionary Powers)

    संविधान में राज्यपाल को कुछ स्थितियों में अपने विवेक (Discretion) का प्रयोग करने की शक्ति दी गई है (अनुच्छेद 163):

    • किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित करना।
    • राज्य में राष्ट्रपति शासन (Article 356) लगाने की सिफारिश करना।
    • त्रिशंकु विधानसभा (Hung Assembly) की स्थिति में मुख्यमंत्री की नियुक्ति करना।
    • यदि मंत्रिपरिषद विधानसभा में बहुमत खो दे, तो उसे बर्खास्त करना या विधानसभा को भंग करना।

    निष्कर्ष

    राज्यपाल राज्य शासन की धुरी है। यद्यपि वह नाममात्र का प्रमुख होता है और मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करता है, लेकिन संघीय ढांचे में उसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह केंद्र और राज्य के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी (Link) के रूप में कार्य करता है।