Tag: Justice

  • प्लेटो का न्याय का सिद्धांत

    प्लेटो का न्याय का सिद्धांत (Republic आधारित)

    1) एथेंस: सुकरात का संवाद-परिदृश्य

    Republic की शुरुआत एथेंस/पीरियस में होती है, जहाँ सुकरात अपने साथियों के साथ सेफ़ेलस (वयोवृद्ध), पोलेमार्कस (उसका पुत्र), थ्रेसिमेकस (सोफ़िस्ट) और आगे चलकर ग्लॉकोंअडाइमैन्टस के साथ न्याय पर चर्चा करते हैं। यह मंचन सिर्फ़ प्रस्तावनात्मक नहीं, बल्कि न्याय की अवधारणा को बहु-दृष्टियों से टटोलता है—यहीं से प्लेटो (सुकरात की ज़ुबानी) अपनी विचार-यात्रा आगे बढ़ाते हैं।

    Bare Text
    जगह = एथेंस/पीरियस • नायक = सुकरात • तरीका = संवाद/प्रतिवाद • उद्देश्य = “न्याय क्या है?”

    2) न्याय की मूल अवधारणा (संक्षेप)

    प्लेटो के यहाँ न्याय कोई मात्र विधि-पालन नहीं; यह व्यक्ति के आत्मिक-संतुलन और राज्य के कार्य-विभाजन से उत्पन्न समरस व्यवस्था है। उनके अनुसार न्याय तब है जब प्रत्येक भाग—व्यक्ति में हो या राज्य में—अपना उचित कार्य करे और अनधिकार-हस्तक्षेप न हो। परिणामतः बुद्धि मार्गदर्शन करे, साहस उसका सहायक बने और इच्छाएँ संयमित रहें।

    • ✔️ न्याय = “अपने कार्य में लगे रहना” (each doing one’s own)
    • ✔️ व्यक्ति-आत्मा: तर्कशील–उदात्त–वासनात्मक भागों का संतुलन
    • ✔️ राज्य: दार्शनिक-शासक–रक्षक–उत्पादक वर्गों का सामंजस्य

    3) बहस का क्रम: कौन क्या कहता है, सुकरात कैसे जवाब देते हैं?

    प्रारम्भिक पुस्तकों में न्याय के कई लोकप्रिय अर्थ उभरते हैं और सुकरात उन्हें जाँचते-परखते हैं। यह क्रम अंततः प्लेटो के सकारात्मक सिद्धांत तक ले जाता है।

    • सेफ़ेलस: “न्याय = सत्य बोलना और देनदारी चुकाना।”
      जवाब: अगर किसी पागल मित्र को उसका हथियार लौटाना पड़े तो?—सब स्थिति में “दे देना” न्याय नहीं।
    • पोलेमार्कस: “न्याय = मित्रों का भला, शत्रुओं का बुरा।”
      जवाब: न्याय किसी को बुरा बनाता नहीं; “मित्र/शत्रु” का निर्णय भी अक्सर भ्रमित कर सकता है।
    • थ्रेसिमेकस: “न्याय = शक्तिशाली का लाभ।” (might is right)
      जवाब: शासक भी भूल कर सकता है; कला/राज-विद्या का सार शासित के हित में है, न कि स्वार्थ में।
    • ग्लॉकों–अडाइमैन्टस: न्याय को लोग मजबूरी में मानते हैं; “रिंग ऑफ़ गायजेस” दिखाता है कि दंड-भय हटे तो लोग अन्याय करेंगे।
      जवाब (आगे की पुस्तकों में): प्लेटो “शहर-आत्मा उपमा” से दिखाते हैं कि न्याय आंतरिक स्वास्थ्य है—स्वयं में श्रेष्ठ, परिणामों से भी बेहतर।

    4) प्लेटो का सकारात्मक सिद्धांत: “अपना कार्य करो”

    प्लेटो न्याय को चार सद्गुणों—बुद्धि, साहस, संयम, न्याय—की समष्टि में समझते हैं। राज्य में तीन वर्ग (दार्शनिक-शासक, रक्षक, उत्पादक) और व्यक्ति में आत्मा के तीन भाग (तर्कशील, उदात्त, वासनात्मक) समान्तर रखे जाते हैं। न्याय वही स्थिति है जहाँ शासक वर्ग/तर्क मार्गदर्शन करे, रक्षक/उदात्त सहायता दे और उत्पादक/वासनात्मक संयमित होकर अपने-अपने कार्य में लगे रहें।

    • ✔️ न्याय (Justice): भूमिकाओं का सम्यक्-निर्धारण और अनधिकार-हस्तक्षेप का न होना
    • ✔️ संयम (Temperance): सभी वर्ग/भागों में सामंजस्य
    • ✔️ साहस (Courage): रक्षक/उदात्त भाग का दृढ़ निश्चय
    • ✔️ बुद्धि (Wisdom): शासक/तर्क का सही मार्गदर्शन

    5) व्यक्ति-स्तर व राज्य-स्तर पर न्याय

    व्यक्ति में न्याय उसका आत्मिक-संतुलन है—तर्क का शासन, उदात्त का सहयोग, और वासनात्मक का संयम। राज्य में न्याय कार्य-विभाजन है—दार्शनिक-शासक शासन/नीति का ज्ञान रखते हैं, रक्षक सुरक्षा/साहस का संबल हैं और उत्पादक वर्ग अर्थ-व्यवस्था का आधार।

    • ✔️ व्यक्ति = आंतरिक स्वास्थ्य
    • ✔️ राज्य = संस्थागत समरसता

    6) पद्धति: शहर–आत्मा उपमा और द्वंद्ववाद

    प्लेटो पहले शहर (State) में न्याय खोजते हैं—बड़ी इकाई में दर्शन स्पष्ट दिखता है—फिर उसी नक्शे से व्यक्ति की आत्मा को पढ़ते हैं। यह एनालॉजी और द्वंद्ववाद (प्रश्नोत्तर से सत्य-उद्घाटन) का संयुक्त तरीका है, जिसमें लोकप्रिय धारणाएँ परखी जाती हैं और क्रमशः एक संगत सिद्धांत निकलता है।

    • ✔️ पहले “शहर” में न्याय → फिर “आत्मा” में प्रतिरूप
    • ✔️ संवाद/प्रतिवाद से चरणबद्ध स्पष्टता

    7) कमियाँ/सीमाएँ (What’s missing?)

    आलोचकों के अनुसार प्लेटो का न्याय-सिद्धांत अत्यधिक समरसतावादी होकर विविधता/स्वतंत्रता को सीमित कर देता है। वर्ग-विभाजन और “अपना कार्य करो” का ज़ोर गतिशीलता घटा सकता है; अभिरक्षकों के लिए निजी संपत्ति/परिवार पर नियंत्रण और Noble Lie जैसी कल्पनाएँ उदार-मानवाधिकार से टकराती हैं। थ्रेसिमेकस/ग्लॉकों की शक्ति/अनुबंध-चुनौतियों का उत्तर देते हुए भी, प्लेटो का मॉडल कुछ हद तक अभिजनवादी और आदर्शवादी प्रतीत होता है—व्यावहारिक लोकतंत्र की भागीदारी/विरोध जैसी प्रक्रियाएँ इसमें कम स्पेस पाती हैं।

    • ⚠️ वर्ग-स्थिरता और सीमित सामाजिक गतिशीलता
    • ⚠️ अभिव्यक्ति/निजता पर नियंत्रण; Noble Lie का नैतिक प्रश्न
    • ⚠️ आधुनिक लोकतंत्र/मानवाधिकार/बहुलता से टकराव
    • ⚠️ “शहर–आत्मा” उपमा की सीमाएँ; अनुभवजन्य प्रमाण कम

    8) समकालीन प्रासंगिकता

    • ✔️ संस्थागत भूमिकाओं की स्पष्टता और जिम्मेदारी
    • ✔️ नैतिक-चरित्र को न्याय का आंतरिक आधार मानना
    • ✔️ नीति-निर्माण में सद्गुण और समरसता का महत्व
    • ✔️ परन्तु: समरसता बनाम स्वतंत्रता—ट्रेडऑफ़ पर सतर्क विमर्श ज़रूरी

    9) निष्कर्ष + MCQs

    प्लेटो के लिए न्याय आंतरिक स्वास्थ्य + सामाजिक समरसता है—व्यक्ति/राज्य में प्रत्येक भाग/वर्ग का अपने कार्य में तत्पर रहना। संवाद-क्रम से लोकप्रिय धारणाएँ परखकर वे एक एकीकृत सिद्धांत तक पहुँचते हैं; हालाँकि इसकी उदार-लोकतांत्रिक आलोचनाएँ गंभीर हैं।

    1. थ्रेसिमेकस के अनुसार न्याय की परिभाषा क्या है?
      (a) सत्य बोलना व ऋण चुकाना (b) मित्रों का भला शत्रुओं का बुरा (c) शक्तिशाली का लाभ (d) अपना कार्य करना
      उत्तर: (c) शक्तिशाली का लाभ
    2. प्लेटो के सकारात्मक सिद्धांत में “न्याय” का सर्वोत्तम सार क्या है?
      (a) अधिकतम धनोपार्जन (b) प्रत्येक का अपने उचित कार्य में लगे रहना (c) युद्ध-प्रवीणता (d) बहुमत का शासन
      उत्तर: (b) प्रत्येक का अपने उचित कार्य में लगे रहना
    3. “शहर–आत्मा उपमा” का उद्देश्य है—
      (a) कला-सौंदर्य का विस्तार (b) छोटे में कठिन दिखने वाली चीज़ को बड़े पैमाने पर स्पष्ट करना (c) कर-व्यवस्था तय करना (d) कवियों की निंदा
      उत्तर: (b) छोटे में कठिन दिखने वाली चीज़ को बड़े पैमाने पर स्पष्ट करना
    4. नीचे में से प्लेटो-आधारित प्रमुख आलोचना कौन-सी है?
      (a) न्याय = सिर्फ़ दंड देना (b) वर्ग-स्थिरता/निजता पर नियंत्रण/नौबल लाई का प्रश्न (c) लोकतंत्र सर्वोत्तम (d) न्याय = आनंद
      उत्तर: (b) वर्ग-स्थिरता/निजता पर नियंत्रण/नौबल लाई का प्रश्न

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  • भारतीय संविधान की उद्देशिका में प्रयुक्त पाँच प्रमुख शब्द




    भारतीय संविधान की उद्देशिका में प्रयुक्त पाँच प्रमुख शब्द हैं:

    1. सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न (Sovereign)


    2. समाजवादी (Socialist)


    3. पंथनिरपेक्ष (Secular)


    4. लोकतांत्रिक (Democratic)


    5. गणराज्य (Republic)



    इन शब्दों को केवल सजावटी भाषा के रूप में नहीं जोड़ा गया, बल्कि ये भारत की राजनीतिक और सामाजिक आत्मा को दर्शाते हैं। आइए प्रत्येक शब्द को गहराई से समझें —




    🔹 1. सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न (Sovereign)

    ● शब्द की उत्पत्ति:

    लैटिन शब्द “superanus” से — अर्थ: “सर्वोच्च” या “सर्वाधिकार प्राप्त।”


    ● पश्चिमी अर्थ:

    राज्य की वह स्थिति जहाँ वह अपने आंतरिक और बाह्य मामलों में स्वतंत्र होता है।

    कोई विदेशी शक्ति, राजा, या संस्था उस पर नियंत्रण नहीं रखती।


    ● भारतीय अर्थ:

    भारत पूर्णतः स्वतंत्र और स्वशासी राष्ट्र है।

    न तो भीतरी मामलों में विदेशी हस्तक्षेप है, न ही बाह्य मामलों में कोई बंधन।


    ● क्यों जोड़ा गया:

    यह बताने के लिए कि ब्रिटिश प्रभुता का पूर्ण अंत हो चुका है।

    भारत अब अपने सभी फैसले स्वतंत्र रूप से करता है।





    🔹 2. समाजवादी (Socialist)

    ● शब्द की उत्पत्ति:

    लैटिन “socius” से — अर्थ: “साथी” या “समाज का सदस्य।”


    ● पश्चिमी अर्थ:

    संपत्ति और उत्पादन के साधनों पर राज्य का स्वामित्व।

    वर्गहीन समाज, पूंजीवाद का विरोध, और सामाजिक समानता।


    ● भारतीय अर्थ:

    लोकतांत्रिक समाजवाद, जहाँ राज्य कल्याणकारी योजनाओं और संसाधनों के न्यायसंगत वितरण की जिम्मेदारी लेता है।

    भारत में निजी संपत्ति को समाप्त नहीं किया गया, बल्कि नियमन और समाज के प्रति उत्तरदायित्व पर जोर दिया गया।


    ● कब जोड़ा गया:

    42वां संविधान संशोधन, 1976 (आपातकाल के समय)


    ● क्यों जोड़ा गया:

    आर्थिक असमानता को कम करने और सामाजिक न्याय को प्राथमिकता देने की संवैधानिक प्रतिबद्धता दर्शाने के लिए।





    🔹 3. पंथनिरपेक्ष (Secular)

    ● शब्द की उत्पत्ति:

    लैटिन “saeculum” से — अर्थ: “सांसारिक” या “धार्मिक नहीं।”


    ● पश्चिमी अर्थ:

    धर्म और राज्य के पूर्ण पृथक्करण की व्यवस्था (जैसे फ्रांस या अमेरिका में)।

    सरकार न किसी धर्म को बढ़ावा देती है, न उसके काम में हस्तक्षेप करती है।


    ● भारतीय अर्थ:

    भारत धर्मविहीन राष्ट्र नहीं है, बल्कि सभी पंथों के प्रति समान सम्मान और व्यवहार की नीति अपनाता है।

    राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं होता।

    नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25–28) प्राप्त है।


    ● कब जोड़ा गया:

    42वां संशोधन, 1976


    ● क्यों जोड़ा गया:

    भारत की धार्मिक विविधता और सांप्रदायिक सौहार्द को सुनिश्चित करने हेतु स्पष्ट संवैधानिक दिशा देने के लिए।





    ⚖️ पंथनिरपेक्ष बनाम धर्मनिरपेक्ष

    बिंदु धर्मनिरपेक्ष पंथनिरपेक्ष

    अर्थ राज्य धर्म से पूर्णतः अलग राज्य सभी पंथों के प्रति समान व्यवहार रखे
    दृष्टिकोण धर्म को पूरी तरह बाहर रखने वाला धर्म को मान्यता देता है, पर किसी एक का पक्ष नहीं लेता
    व्यवहार धर्म का पूर्ण निषेध या उपेक्षा सभी धर्मों को समान अधिकार और सम्मान
    भारत में उपयुक्त ❌ (भारतीय संस्कृति में धर्म को पूरी तरह नकारना संभव नहीं) ✅ (सभी धर्मों की समानता को मान्यता मिलती है)


    👉 इसलिए भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष नहीं बल्कि पंथनिरपेक्ष है — यानी सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखना, न किसी का समर्थन, न विरोध।




    🔹 4. लोकतांत्रिक (Democratic)

    ● शब्द की उत्पत्ति:

    ग्रीक “demos” (जनता) + “kratos” (शक्ति) = “जनता का शासन”


    ● पश्चिमी अर्थ:

    जनता द्वारा चुनी गई सरकार, चुनाव, कानून का शासन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।


    ● भारतीय अर्थ:

    भारत में प्रतिनिधित्वात्मक लोकतंत्र है — नागरिक प्रत्यक्ष रूप से वोट के द्वारा अपने प्रतिनिधि चुनते हैं।

    समान मतदान अधिकार, बहुदलीय प्रणाली, स्वतंत्र न्यायपालिका, और मौलिक अधिकारों की व्यवस्था।


    ● क्यों जोड़ा गया:

    औपनिवेशिक शासन से निकलकर जनता की संप्रभुता को स्थापित करने के लिए।





    🔹 5. गणराज्य (Republic)

    ● शब्द की उत्पत्ति:

    लैटिन “res publica” से — अर्थ: “जनसामान्य का मामला”


    ● पश्चिमी अर्थ:

    ऐसा राष्ट्र जहाँ राज्य का प्रमुख वंशानुगत राजा नहीं होता, बल्कि चुना हुआ होता है।


    ● भारतीय अर्थ:

    भारत का राष्ट्रपति चुना जाता है, न कि किसी वंशानुगत परिवार से आता है।

    भारत में कोई राजतंत्र नहीं है, और सभी पद योग्यता और संविधान के अनुसार मिलते हैं।


    ● क्यों जोड़ा गया:

    सामाजिक समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित करने हेतु।






    🧭 निष्कर्ष:

    उद्देशिका में प्रयुक्त ये पाँच शब्द केवल आदर्श नहीं हैं — ये भारत के संविधान की मूल आत्मा हैं। इनमें से समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्द 1976 में जोड़े गए, लेकिन उनका भाव पहले से ही संविधान में समाहित था।

    भारत का संविधान न तो धर्मविरोधी है, न ही किसी एक पंथ का समर्थक — वह हर नागरिक को समान दृष्टि से देखता है।

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  • भारतीय संविधान की उद्देशिका: इतिहास, अर्थ और महत्व

    भारतीय संविधान की उद्देशिका (Preamble) केवल एक औपचारिक प्रस्तावना नहीं है — यह संविधान की आत्मा है। कुछ संक्षिप्त लेकिन गंभीर शब्दों में यह हमारे संविधान निर्माताओं की दृष्टि, मूल्यों और आदर्शों को अभिव्यक्त करती है, जिसने विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान तैयार किया।

    इस लेख में हम जानेंगे:

    उद्देशिका का ऐतिहासिक संदर्भ

    उसका वास्तविक अर्थ और महत्व

    उसमें निहित चार प्रमुख तत्त्व

    26 जनवरी 1950 की ऐतिहासिक तिथि का चयन क्यों हुआ

    और संविधान अपनाए जाने के दो महीने बाद ही लागू क्यों हुआ





    उद्देशिका का ऐतिहासिक संदर्भ

    उद्देशिका का विचार बिल्कुल नया नहीं था। अमेरिकी संविधान में भी एक उद्देशिका है, और भारत की संविधान सभा ने कई वैश्विक स्रोतों से प्रेरणा ली। यद्यपि संविधान निर्माण की प्रक्रिया के अंत में इसकी चर्चा हुई, लेकिन इसका आत्मिक प्रभाव प्रारंभ से ही समस्त बहसों पर रहा।

    डॉ. भीमराव अंबेडकर ने प्रारंभ में कहा था कि उद्देशिका को संविधान के पूर्ण होने के बाद लिया जाना चाहिए। लेकिन पंडित जवाहरलाल नेहरू और बी.एन. राव जैसे नेताओं ने यह सुनिश्चित किया कि उद्देशिका की भावना पूरे संविधान को दिशा दे।

    👉 उद्देशिका का प्रारूप पंडित नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ (Objective Resolution) के रूप में प्रस्तुत किया था, जिसे 22 जनवरी 1947 को अपनाया गया।

    👉 अंतिम रूप से 26 नवम्बर 1949 को संविधान के साथ उद्देशिका को भी अंगीकृत कर लिया गया।
    👉 लेकिन इसे लागू किया गया 26 जनवरी 1950 को — जो भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण तिथि है।




    उद्देशिका का अर्थ और महत्व

    उद्देशिका संविधान का प्रस्तावना वक्तव्य है, जो कहती है:

    > “हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए… न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता सुनिश्चित करने के लिए यह संविधान आत्मार्पित करते हैं।”



    यह उद्घोष करता है:

    1. संविधान का स्रोत कौन है — भारत की जनता


    2. भारत को कैसा राष्ट्र बनाना है — सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य


    3. संविधान किन लक्ष्यों को प्राप्त करना चाहता है — न्याय, स्वतंत्रता, समता, बंधुता



    यह केवल शब्द नहीं हैं — ये भारतीय राष्ट्र की संवैधानिक आत्मा और मार्गदर्शक सिद्धांत हैं।




    उद्देशिका के चार प्रमुख तत्त्व

    1. शक्ति का स्रोत: “हम भारत के लोग…”

    इस वाक्य से स्पष्ट होता है कि संविधान जनता द्वारा, जनता के लिए बनाया गया है। यह किसी राजा या ब्रिटिश संसद की कृपा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संप्रभुता का प्रतीक है।

    2. भारतीय संविधान की प्रकृति

    उद्देशिका भारत को निम्नलिखित स्वरूप में प्रस्तुत करती है:

    सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न (Sovereign): भारत पूरी तरह स्वतंत्र है, किसी विदेशी शक्ति का अधीन नहीं।

    समाजवादी (Socialist): आर्थिक और सामाजिक समानता का लक्ष्य।

    पंथनिरपेक्ष (Secular): राज्य सभी धर्मों से समदूरी रखता है, न किसी धर्म का विरोध करता है, न समर्थन।

    लोकतांत्रिक (Democratic): जनता द्वारा चुनी गई सरकार।

    गणराज्य (Republic): राष्ट्र प्रमुख (President) जनता द्वारा निर्वाचित होता है, कोई वंशानुगत राजा नहीं होता।


    3. संविधान के उद्देश्य

    उद्देशिका भारत को निम्नलिखित लक्ष्यों की प्राप्ति का वचन देती है:

    न्याय (Justice): सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समानता।

    स्वतंत्रता (Liberty): विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता।

    समता (Equality): सभी नागरिकों को समान अवसर और दर्जा।

    बंधुता (Fraternity): व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्रीय एकता सुनिश्चित करना।


    4. अंगीकरण की तिथि: 26 नवम्बर 1949

    यद्यपि उद्देशिका को संविधान के साथ 26 नवम्बर 1949 को अपनाया गया, इसे लागू किया गया 26 जनवरी 1950 को।




    26 जनवरी क्यों चुनी गई?

    26 जनवरी 1930 को लाहौर अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ‘पूर्ण स्वराज’ (Complete Independence) की घोषणा की थी।

    👉 उस दिन को चिह्नित करने के लिए संविधान लागू करने की तिथि भी 26 जनवरी रखी गई।
    👉 यह केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि एक राजनीतिक घोषणा थी — अब भारत केवल स्वतंत्र नहीं, बल्कि संवैधानिक रूप से स्वशासित गणराज्य बन गया था।




    संविधान दो महीने बाद लागू क्यों हुआ?

    यद्यपि संविधान को 26 नवम्बर 1949 को अंगीकृत कर लिया गया था, लेकिन इसे पूरा लागू करने में दो महीने का समय लगा, उसके पीछे कुछ कारण थे:

    1. प्रशासनिक तैयारी: केंद्र और राज्यों में संविधान के अनुरूप ढांचा बनाना था।


    2. राष्ट्रपति का पदभार ग्रहण: डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने 26 जनवरी 1950 को पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली।


    3. ब्रिटिश प्रभुता का अंतिम समापन: भारत अब गणराज्य था — किसी भी विदेशी सत्ता से पूर्णतः स्वतंत्र।






    निष्कर्ष: आज भी क्यों महत्वपूर्ण है उद्देशिका?

    यद्यपि उद्देशिका न्यायालय में लागू करने योग्य नहीं है, लेकिन यह संवैधानिक व्याख्या का आधार है।

    👉 सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) मामले में कहा कि उद्देशिका संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का हिस्सा है।

    यह हमें यह याद दिलाती है कि भारत किन मूल्यों पर खड़ा है — और किस दिशा में बढ़ना चाहता है। जब भी भारत को सामाजिक, राजनीतिक या धार्मिक संकट का सामना होता है, उद्देशिका एक नैतिक मार्गदर्शिका बनकर सामने आती है।