🇮🇳 भारत की भू-आर्थिक रणनीति (India’s Geo-Economic Strategy)
21वीं सदी में वैश्विक राजनीति का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। सैन्य शक्ति के साथ-साथ अब आर्थिक शक्ति—वैश्विक व्यापार, तकनीक, अवसंरचना, ऊर्जा और आपूर्ति-श्रृंखलाएँ—राष्ट्रों की रणनीतिक क्षमता को परिभाषित करती हैं। इसी बदले हुए परिदृश्य में भारत की भू-आर्थिक रणनीति उसकी विदेश नीति का केंद्रीय तत्व बनी है।
1. व्यापार एवं वैश्विक बाज़ारों में भारत की रणनीति
भारत अपने व्यापारिक संबंधों को बहुआयामी बनाकर एक मजबूत आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। पहले भारत सीमित देशों पर निर्भर था, परंतु अब उसने पश्चिम एशिया, अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और इंडो-पैसिफिक देशों के साथ व्यापार को विस्तार दिया है। UAE के साथ CEPA और ऑस्ट्रेलिया के साथ ECTA जैसे समझौते भारत को वैश्विक मूल्य-श्रृंखलाओं से अधिक मजबूती से जोड़ते हैं।
PLI योजनाओं के माध्यम से भारत विनिर्माण का बड़ा केंद्र बन रहा है, जिससे निर्यात क्षमता बढ़ रही है और रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूती मिलती है।
2. वैश्विक आपूर्ति-श्रृंखलाओं में भारत का उभार
महामारी के बाद दुनिया को चीन पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम का अहसास हुआ। इस परिस्थिति में भारत “चीन-प्लस-वन” रणनीति का प्रमुख विकल्प बनकर उभरा है। Apple, Samsung जैसी कंपनियों का उत्पादन भारत में स्थानांतरित होना इसका प्रमाण है।
IPEF जैसे ढांचे में भारत की भागीदारी supply chain security को मजबूत करती है।
इसके साथ ही भारत लिथियम, कोबाल्ट, निकल जैसे critical minerals के लिए अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और लैटिन अमेरिका के साथ साझेदारी विकसित कर रहा है ताकि भविष्य के EV और semiconductor उद्योग सुरक्षित रह सकें।
3. ऊर्जा सुरक्षा और भारत की भू-अर्थव्यवस्था
भारत ऊर्जा आयात पर निर्भर है, इसलिए ऊर्जा सुरक्षा उसकी रणनीति का मुख्य आधार है। पश्चिम एशिया—सऊदी अरब, UAE, कतर—भारत के प्रमुख ऊर्जा साझेदार हैं।
रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता दिखाते हुए सस्ता रूसी तेल खरीदा, जिससे ऊर्जा लागत कम हुई और आर्थिक स्थिरता बनी रही।
नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में International Solar Alliance के माध्यम से भारत वैश्विक नेतृत्व स्थापित कर रहा है। 2030 तक 450 GW renewable क्षमता का लक्ष्य भारत को clean energy में विश्व-स्तरीय शक्ति बना सकता है।
4. कनेक्टिविटी और अवसंरचना आधारित भू-अर्थशास्त्र
वैश्विक प्रभाव उन देशों को मिलता है जिनका व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण होता है। इसी उद्देश्य से भारत ने IMEC (India-Middle East-Europe Economic Corridor) में प्रमुख भूमिका निभाई है, जो चीन की BRI का सशक्त विकल्प है।
चाबहार बंदरगाह—भारत की मध्य एशिया तक पहुँच—पाकिस्तान को भू-राजनीतिक बाधा के रूप में बायपास करता है।
INSTC (India-Iran-Russia Corridor) यूरोप तक तेज़ और सस्ता व्यापार मार्ग खोलता है।
ये गलियारे भारत को वैश्विक सप्लाई मैप का केंद्र बना रहे हैं।
5. तकनीकी भू-अर्थशास्त्र: भविष्य की शक्ति
आज तकनीक ही आर्थिक और रणनीतिक शक्ति का मूल है। भारत semiconductor उद्योग विकसित कर रहा है और अमेरिका, जापान व ताइवान के साथ साझेदारी को मजबूत कर रहा है।
डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर—UPI, आधार—विश्वभर में अपनाया जा रहा है, जिससे भारत की “डिजिटल कूटनीति” प्रभावशाली बन रही है।
5G/6G नेटवर्क में सुरक्षित और विश्वसनीय तकनीक को प्राथमिकता देकर भारत ने अपनी तकनीकी संप्रभुता को मजबूत किया है।
6. मुद्रा और वित्तीय भू-अर्थशास्त्र
भारत अपनी आर्थिक स्वतंत्रता को बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रुपये के उपयोग को बढ़ावा दे रहा है। रूस, श्रीलंका और मॉरीशस जैसे देशों ने इसे स्वीकार किया है।
G20 अध्यक्षता के दौरान भारत ने वैश्विक दक्षिण (Global South) के देशों की आवाज़ को मजबूत किया और ऋण सुधारों पर वैश्विक चर्चा को आगे बढ़ाया।
7. प्रमुख चुनौतियाँ
चीन की विशाल विनिर्माण क्षमता और आर्थिक प्रभुत्व भारत की प्रमुख चुनौती है।
घरेलू अवसंरचना, skill development, logistics लागत और तकनीकी क्षमता में सुधार आवश्यक है।
ऊर्जा निर्भरता और FTA वार्ताओं में घरेलू क्षेत्रों की चिंता भी संतुलित निर्णय मांगती है।
भारत की भू-अर्थशास्त्रीय रणनीति आर्थिक शक्ति, कूटनीति, तकनीक और अवसंरचना को एकीकृत करके बनाई गई व्यापक राष्ट्रीय रणनीति है।
इसका लक्ष्य भारत को बहुध्रुवीय विश्व में एक स्वतंत्र, प्रभावशाली और स्थिर शक्ति के रूप में स्थापित करना है।
भविष्य निश्चित रूप से भारत की भू-अर्थव्यवस्था के माध्यम से ही आकार लेगा।
