Category: Foreign Policy of India

  • वैश्विक आर्थिक और सैन्य शक्ति के रूप में भारत

    विषय 1: वैश्विक आर्थिक और सैन्य शक्ति के रूप में भारत

    21वीं सदी में भारत की दिशा एक “संतुलनकारी शक्ति” से आगे बढ़कर एक “नेतृत्वकारी शक्ति” के रूप में स्थापित हो चुकी है। यह परिवर्तन दो मुख्य स्तंभों पर आधारित है: एक मज़बूत और उच्च-विकास करती अर्थव्यवस्था, तथा तीव्र गति से आधुनिक हो रही सैन्य शक्ति। 2024–25 के परिप्रेक्ष्य में भारत केवल दक्षिण एशिया का क्षेत्रीय दिग्गज नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था में एक निर्णायक ध्रुव बन चुका है—जो केवल वैश्विक परिस्थितियों पर प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि परिणामों को आकार देने की क्षमता भी रखता है।

    A. आर्थिक महाशक्ति: वैश्विक विकास का इंजन

    भारत की आर्थिक कहानी “Fragile Five” से “Top Five” तक पहुँच चुकी है। 4 ट्रिलियन डॉलर (Nominal GDP) को पार करते हुए और Purchasing Power Parity (PPP) के आधार पर विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित होकर, भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से विकसित होती प्रमुख अर्थव्यवस्था है।

    1. व्यापक आर्थिक स्थिरता और बड़े पैमाने का प्रभाव

    भारत की अर्थव्यवस्था का पैमाना देश को गहरी कूटनीतिक शक्ति प्रदान करता है।

    GDP रैंकिंग:

    2025 में भारत नाममात्र GDP के आधार पर विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित हो चुका है, जापान को पीछे छोड़ते हुए और जर्मनी के समीप पहुँचते हुए।
    अनुमान है कि 2027 तक भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा—केवल अमेरिका और चीन उसके आगे होंगे।

    विदेश मुद्रा भंडार:

    2024 के अंत तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 700 बिलियन डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर को पार कर चुका है।
    यह विशाल भंडार भारत को वैश्विक वित्तीय अस्थिरताओं से सुरक्षा देता है और भारत को आर्थिक दबावों से मुक्त रखकर स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने में सक्षम बनाता है।

    विकास दर:

    विश्व अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ रही है, लेकिन भारत निरंतर 6.5%–7% की विकास दर बनाए हुए है।
    यह स्थायी वृद्धि भारत को विश्व की आर्थिक वृद्धि का प्रमुख इंजन बनाती है, जो दुनिया की कुल आर्थिक वृद्धि में लगभग 16% का योगदान देता है।

    2. डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI) क्रांति

    भारत ने “डिजिटल पब्लिक गुड्स” पर आधारित एक अनूठा आर्थिक मॉडल विकसित किया है।

    UPI (Unified Payments Interface):

    भारत दुनिया के लगभग 46% रियल-टाइम डिजिटल लेनदेन का संचालन करता है।
    UPI की सफलता अब वैश्विक स्तर पर अपनाई जा रही है—फ्रांस, सिंगापुर और UAE जैसे देशों ने भारतीय भुगतान प्रणाली को अपने सिस्टम में एकीकृत किया है।

    इंडिया स्टैक:

    पहचान (Aadhaar), भुगतान (UPI) और डेटा (Account Aggregators) के त्रिकोण ने भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को औपचारिक रूप में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
    DBT (Direct Benefit Transfers) ने सरकारी व्यय में भारी बचत कराई है, क्योंकि इससे भ्रष्टाचार और रिसाव कम हुए हैं, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया गया है।

    3. विनिर्माण और अवसंरचना (PLI का तेज़ प्रभाव)

    भारत “सेवाओं की अर्थव्यवस्था” से आगे बढ़कर “वैश्विक विनिर्माण केंद्र” बनने की दिशा में तेज़ी से बढ़ रहा है।

    PLI योजनाएँ:

    इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, ऑटोमोटिव सहित 14 प्रमुख क्षेत्रों में उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजनाओं ने Apple और Samsung जैसे वैश्विक दिग्गजों को अपने विनिर्माण संचालन भारत में स्थानांतरित करने के लिए प्रोत्साहित किया है।

    अवसंरचना निवेश:

    सरकार ने कैपिटल एक्सपेंडिचर में ऐतिहासिक बढ़ोतरी की है—
    • हाईवे 30–40 किलोमीटर प्रतिदिन की दर से निर्माणाधीन हैं।
    • रेलवे प्रणाली का बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण हो रहा है।
    • UDAN योजना से हवाई कनेक्टिविटी दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँची है।

    डिजिटल अर्थव्यवस्था:

    2024 में डिजिटल अर्थव्यवस्था भारत के GDP में 12–13% योगदान दे रही है।
    यह संख्या 2029–30 तक बढ़कर 20% हो सकती है।

    B. सैन्य शक्ति: आयातक से निर्यातक बनने की दिशा में भारत

    Global Firepower Index 2025 के अनुसार भारत विश्व की चौथी सबसे शक्तिशाली सैन्य शक्ति है।
    लेकिन केवल रैंक ही नहीं, बल्कि सैन्य क्षमता का गुणात्मक परिवर्तन अधिक महत्वपूर्ण है।
    भारत का सैन्य सिद्धांत अब “defensive deterrence” से “proactive strategy” में विकसित हुआ है।
    और हथियार खरीद नीति “buy global” से “make global” हो रही है।

    1. रणनीतिक क्षमता और पूर्ण कार्यशील न्यूक्लियर ट्रायड

    भारत उन कुछ देशों में शामिल है जिनके पास पूर्णत: operational Nuclear Triad है—
    भूमि, वायु और समुद्र तीनों से परमाणु हथियार दागने की क्षमता।

    भूमि आधारित क्षमता:

    अग्नि श्रृंखला की मिसाइलें—Agni-V (5000+ km रेंज) एशिया के अधिकांश भाग और यूरोप के हिस्सों को कवर करती है।

    वायु आधारित क्षमता:

    Dassault Rafale और Sukhoi-30MKI विमानों को परमाणु-सक्षम डिलीवरी सिस्टम से लैस किया गया है।

    समुद्र आधारित क्षमता:

    INS Arihant-श्रेणी की परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियाँ भारत को “second-strike capability” प्रदान करती हैं।

    2. स्वदेशीकरण: रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत

    भारत रूस और पश्चिमी देशों पर रक्षा निर्भरता कम कर रहा है और पूर्ण रणनीतिक स्वायत्तता की दिशा में बढ़ रहा है।

    INS Vikrant:

    भारत का पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत—जो भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में लाता है जिनके पास ऐसा निर्माण कौशल है।

    Tejas MK-1A:

    4.5-जनरेशन का हल्का लड़ाकू विमान, जो पुराने MiG-21 बेड़े की जगह ले रहा है।

    LCH Prachand:

    विश्व का एकमात्र हमला-हेलीकॉप्टर जो 5000 मीटर ऊँचाई पर टेकऑफ़ और लैंडिंग कर सकता है—सियाचिन जैसे इलाकों में अत्यंत महत्वपूर्ण।

    रक्षा औद्योगिक गलियारे:

    UP और तमिलनाडु में बनाए गए रक्षा गलियारों ने MSMEs के लिए एक विशाल उत्पादन पारिस्थितिकी तंत्र तैयार किया है।

    3. रक्षा निर्यात: एक नया युग

    भारत, जो कभी दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक था, अब प्रमुख रक्षा निर्यातक बनने की ओर उभर रहा है।

    रिकॉर्ड निर्यात:

    2023–24 में भारत के रक्षा निर्यात ₹21,083 करोड़ ($2.6 बिलियन) तक पहुँच गए।
    2024–25 में भी यह रुझान बढ़ रहा है।

    मुख्य ग्राहक:

    • फिलीपींस – BrahMos मिसाइल

    • आर्मेनिया – तोपखाना प्रणाली

    • 85+ देश – विभिन्न रक्षा उपकरण

    4. हिंद महासागर क्षेत्र में “नेट सिक्योरिटी प्रदाता”

    भारत अब समुद्री क्षेत्र में अपनी सैन्य भूमिका को केंद्र में रख रहा है।

    Mission-Based Deployments:

    भारतीय नौसेना महत्वपूर्ण समुद्री chokepoints—जैसे मलक्का जलडमरूमध्य और होर्मुज़ जलडमरूमध्य—पर निरंतर उपस्थिति बनाए रखती है।

    मानवीय सहायता और आपदा प्रतिक्रिया:

    भारत क्षेत्रीय देशों के लिए “पहला प्रत्युत्तरकर्ता” है—
    मोज़ाम्बिक, मालदीव, श्रीलंका में राहत कार्य तथा लाल सागर–अरब सागर में एंटी-पायरेसी अभियान इसकी मिसाल हैं।

    निष्कर्ष

    भारत का “नेतृत्वकारी शक्ति” होने का दावा अब केवल आकांक्षात्मक नहीं, बल्कि वास्तविकता पर आधारित है।
    एक मज़बूत अर्थव्यवस्था—जो रक्षा क्षमताओं को वित्तीय आधार देती है—और एक सक्षम सैन्य शक्ति—जो आर्थिक हितों की रक्षा करती है—दोनों मिलकर एक सकारात्मक रणनीतिक चक्र (virtuous cycle) बना रही हैं।
    उच्च विदेशी मुद्रा भंडार और स्वदेशी रक्षा उत्पादन भारत को बाहरी झटकों से सुरक्षित रखते हैं और वैश्विक स्तर पर एक स्थिर, भरोसेमंद शक्ति के रूप में स्थापित कर रहे हैं।

  • बहु-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था और भारत

    विषय 2: बहु-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था और भारत (Multi-polar World Order and India)

    21वीं सदी की वैश्विक भू-राजनीति (Geopolitics) में सबसे युगांतरकारी परिवर्तन “एक-ध्रुवीय” (Unipolar) दुनिया से “बहु-ध्रुवीय” (Multi-polar) व्यवस्था की ओर संक्रमण है। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद लगभग तीन दशकों तक संयुक्त राज्य अमेरिका का निर्विवाद वर्चस्व रहा, जिसे ‘पैक्स अमेरिकाना’ कहा गया। लेकिन अब शक्ति के केंद्र बदल रहे हैं। चीन का उदय, रूस का पुनरुत्थान, और भारत, ब्राजील व दक्षिण अफ्रीका जैसी शक्तियों का उभार यह दर्शाता है कि अब दुनिया किसी एक देश के इशारे पर नहीं चल सकती।

    भारत न केवल इस बहु-ध्रुवीय व्यवस्था का मूक दर्शक है, बल्कि वह इसका एक सक्रिय वास्तुकार (Architect) है। भारत का स्पष्ट मानना है कि एक लोकतांत्रिक विश्व व्यवस्था के लिए बहु-ध्रुवीयता आवश्यक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कई मंचों पर दोहराया है कि “एशिया की बहु-ध्रुवीयता के बिना विश्व की बहु-ध्रुवीयता संभव नहीं है।”


    1. बहु-ध्रुवीयता की अवधारणा और भारत का कूटनीतिक दृष्टिकोण

    बहु-ध्रुवीयता का अर्थ केवल कई शक्तियों का होना नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ अंतर्राष्ट्रीय निर्णय आम सहमति, कानून के शासन और संप्रभुता के सम्मान पर आधारित होते हैं। भारत के लिए, यह एक रणनीतिक अवसर है।

    गुटनिरपेक्षता से बहु-संरेखण तक (From Non-Alignment to Multi-Alignment):

    • ऐतिहासिक संदर्भ: शीत युद्ध के दौरान, भारत ने गुटनिरपेक्षता (NAM) की नीति अपनाई थी ताकि वह अमेरिका या सोवियत संघ के गुटों में फंसकर अपनी स्वतंत्रता न खो दे। उस समय का उद्देश्य ‘दूरी बनाए रखना’ था।
    • वर्तमान नीति (बहु-संरेखण): आज की दुनिया में भारत की नीति ‘बहु-संरेखण’ (Multi-alignment) की है। इसका अर्थ है “सबके साथ जुड़ना, लेकिन अपनी शर्तों पर।” भारत एक ही समय में अमेरिका के साथ सैन्य अभ्यास कर रहा है और रूस के साथ ऊर्जा व्यापार कर रहा है। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि भारत के आत्मविश्वास का प्रतीक है।
    • विषय-आधारित गठबंधन: अब भारत स्थायी दोस्त या दुश्मन बनाने के बजाय ‘मुद्दों’ पर ध्यान केंद्रित करता है। तकनीक के लिए भारत पश्चिम (West) की ओर देखता है, ऊर्जा और रक्षा स्पेयर पार्ट्स के लिए रूस की ओर, और ग्लोबल साउथ के विकास के लिए अफ्रीका और एशिया की ओर।

    2. रणनीतिक स्वायत्तता: भारतीय विदेश नीति की रीढ़

    बहु-ध्रुवीय दुनिया में सबसे बड़ी चुनौती अपनी स्वतंत्रता बनाए रखना है। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में दिखाया है कि वह किसी भी महाशक्ति के दबाव में झुके बिना अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सकता है। इसे ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) कहा जाता है।

    उदाहरण और केस स्टडीज:

    • रूस-यूक्रेन संघर्ष और तेल कूटनीति: फरवरी 2022 के बाद, जब पश्चिमी देशों ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए, तो भारत पर भी रूस से संबंध तोड़ने का भारी दबाव था। लेकिन भारत ने अपने नागरिकों के हितों को सर्वोपरि रखा। भारत ने रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदना जारी रखा। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने यूरोप को आईना दिखाते हुए कहा कि “यूरोप को इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा कि यूरोप की समस्याएं दुनिया की समस्याएं हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं यूरोप की नहीं।” इस साहसिक कदम ने भारत की मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखा और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित की।
    • रक्षा सौदे (S-400 मिसाइल सिस्टम): अमेरिका के CAATSA (प्रतिबंध कानून) की धमकी के बावजूद, भारत ने अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिए रूस से S-400 वायु रक्षा प्रणाली की खरीद को पूरा किया। यह साबित करता है कि भारत अपनी रक्षा नीति वॉशिंगटन या बीजिंग में तय नहीं करता, बल्कि नई दिल्ली में तय करता है।

    3. ग्लोबल साउथ की बुलंद आवाज़ (Voice of the Global South)

    दुनिया अमीर ‘ग्लोबल नॉर्थ’ और विकासशील ‘ग्लोबल साउथ’ में बंटी हुई है। चीन खुद को ग्लोबल साउथ का नेता बताता रहा है, लेकिन उसकी ‘ऋण-जाल कूटनीति’ (Debt Trap Diplomacy) ने उसे अलोकप्रिय बना दिया है। इस शून्य को भरने के लिए भारत आगे आया है।

    • G20 अध्यक्षता (2023) – एक गेम चेंजर: भारत ने अपनी G20 अध्यक्षता को केवल बड़े देशों की बैठक नहीं रहने दिया। भारत ने “वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट” का आयोजन किया, जिसमें 125 देशों ने भाग लिया। भारत ने इन देशों की समस्याओं (कर्ज, खाद्य संकट, जलवायु परिवर्तन) को G20 के एजेंडे में सबसे ऊपर रखा।
    • अफ़्रीकी संघ (AU) की सदस्यता: भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत अफ़्रीकी संघ को G20 का स्थायी सदस्य बनाना था। इससे 55 अफ्रीकी देशों को वैश्विक मंच पर पहली बार इतना बड़ा प्रतिनिधित्व मिला। इसने भारत को अफ्रीका का सच्चा मित्र साबित किया।
    • मानवीय सहायता और ‘फर्स्ट रेस्पोंडर’: तुर्की में भूकंप हो, मालदीव में जल संकट हो, या श्रीलंका का आर्थिक पतन—भारत हमेशा मदद के लिए सबसे पहले पहुँचता है। ‘ऑपरेशन दोस्त’ और ‘वैक्सीन मैत्री’ ने भारत की छवि एक ‘विश्व-बंधु’ (दुनिया का मित्र) के रूप में बनाई है।

    4. सुधारित बहुपक्षवाद (Reformed Multilateralism)

    भारत का मानना है कि 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाए गए संस्थान (जैसे UN, IMF, World Bank) आज की 21वीं सदी की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करते। उस समय 50 देश थे, आज 193 से अधिक हैं। इसलिए, भारत “सुधारित बहुपक्षवाद” की मांग कर रहा है।

    • UNSC में स्थायी सीट की दावेदारी: भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, सबसे बड़ा लोकतंत्र है, और 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इसके बिना संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की कोई विश्वसनीयता नहीं है। भारत G4 देशों (ब्राजील, जर्मनी, जापान) के साथ मिलकर वीटो पावर के एकाधिकार को चुनौती दे रहा है।
    • वित्तीय संस्थानों का लोकतंत्रीकरण: विश्व बैंक और IMF में अमेरिका और यूरोप का वर्चस्व है। भारत मांग कर रहा है कि इन संस्थाओं में विकासशील देशों को अधिक कोटा और वोटिंग अधिकार मिले ताकि उन्हें कर्ज के लिए अपमानजनक शर्तों का सामना न करना पड़े।

    5. प्रमुख समूहों में संतुलनकारी भूमिका (Bridging Power)

    बहु-ध्रुवीयता का अर्थ है विभिन्न ध्रुवों के बीच संतुलन बनाना। भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जो प्रतिद्वंद्वी समूहों में समान रूप से सक्रिय है।

    A. क्वाड (QUAD) और इंडो-पैसिफिक:

    भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ ‘क्वाड’ का सदस्य है। इसका उद्देश्य चीन के आक्रामक विस्तारवाद को रोकना और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में नेविगेशन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना है। भारत के लिए, क्वाड एक सैन्य गठबंधन नहीं, बल्कि तकनीक और सुरक्षा का मंच है।

    B. ब्रिक्स (BRICS) और शंघाई सहयोग संगठन (SCO):

    दूसरी ओर, भारत ‘ब्रिक्स’ और ‘SCO’ का भी संस्थापक सदस्य है, जहाँ चीन और रूस प्रमुख हैं। भारत इनका उपयोग यह सुनिश्चित करने के लिए करता है कि ये मंच पूरी तरह से ‘पश्चिम-विरोधी’ न बन जाएं। ब्रिक्स के हालिया विस्तार में भारत ने यह सुनिश्चित किया कि निर्णय सर्वसम्मति से हों, न कि केवल चीन की मर्जी से।

    6. आर्थिक बहु-ध्रुवीयता और भविष्य की राह

    सच्ची बहु-ध्रुवीयता तब तक नहीं आ सकती जब तक दुनिया केवल एक मुद्रा (अमेरिकी डॉलर) पर निर्भर है। भारत इस आर्थिक एकाधिकार को तोड़ने का प्रयास कर रहा है।

    • रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण: भारत ने 22 से अधिक देशों के साथ रुपये में व्यापार (Rupee Trade Settlement) शुरू किया है। रूस, यूएई और श्रीलंका जैसे देशों के साथ यह सफल रहा है। इससे डॉलर की कमी होने पर भी व्यापार नहीं रुकता।
    • डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर (UPI): भारत का यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) दुनिया की सबसे सफल डिजिटल भुगतान प्रणाली बन गया है। फ्रांस, सिंगापुर और यूएई के साथ जुड़कर भारत ने पश्चिम की स्विफ्ट (SWIFT) प्रणाली का एक सस्ता और तेज विकल्प पेश किया है।

    निष्कर्ष:
    आज का भारत ‘एक तरफ चुनने’ के लिए मजबूर नहीं है, बल्कि वह खुद एक ‘ध्रुव’ है जिसे दुनिया चुन रही है। भारत की बहु-ध्रुवीयता टकराव की नहीं, बल्कि समन्वय की है। यह प्राचीन भारतीय दर्शन ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ (संपूर्ण विश्व एक परिवार है) का आधुनिक कूटनीतिक रूप है। भारत एक ऐसी विश्व व्यवस्था का निर्माण कर रहा है जहाँ शक्ति का सम्मान हो, लेकिन नियमों की अवहेलना न हो। यही ‘न्यू इंडिया’ की वैश्विक पहचान है।

  • भारत की भू-आर्थिक रणनीति

    🇮🇳 भारत की भू-आर्थिक रणनीति (India’s Geo-Economic Strategy)

    भूमिका:
    21वीं सदी में वैश्विक राजनीति का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। सैन्य शक्ति के साथ-साथ अब आर्थिक शक्ति—वैश्विक व्यापार, तकनीक, अवसंरचना, ऊर्जा और आपूर्ति-श्रृंखलाएँ—राष्ट्रों की रणनीतिक क्षमता को परिभाषित करती हैं। इसी बदले हुए परिदृश्य में भारत की भू-आर्थिक रणनीति उसकी विदेश नीति का केंद्रीय तत्व बनी है।

    1. व्यापार एवं वैश्विक बाज़ारों में भारत की रणनीति

    भारत अपने व्यापारिक संबंधों को बहुआयामी बनाकर एक मजबूत आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। पहले भारत सीमित देशों पर निर्भर था, परंतु अब उसने पश्चिम एशिया, अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और इंडो-पैसिफिक देशों के साथ व्यापार को विस्तार दिया है। UAE के साथ CEPA और ऑस्ट्रेलिया के साथ ECTA जैसे समझौते भारत को वैश्विक मूल्य-श्रृंखलाओं से अधिक मजबूती से जोड़ते हैं।
    PLI योजनाओं के माध्यम से भारत विनिर्माण का बड़ा केंद्र बन रहा है, जिससे निर्यात क्षमता बढ़ रही है और रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूती मिलती है।

    2. वैश्विक आपूर्ति-श्रृंखलाओं में भारत का उभार

    महामारी के बाद दुनिया को चीन पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम का अहसास हुआ। इस परिस्थिति में भारत “चीन-प्लस-वन” रणनीति का प्रमुख विकल्प बनकर उभरा है। Apple, Samsung जैसी कंपनियों का उत्पादन भारत में स्थानांतरित होना इसका प्रमाण है।
    IPEF जैसे ढांचे में भारत की भागीदारी supply chain security को मजबूत करती है।
    इसके साथ ही भारत लिथियम, कोबाल्ट, निकल जैसे critical minerals के लिए अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और लैटिन अमेरिका के साथ साझेदारी विकसित कर रहा है ताकि भविष्य के EV और semiconductor उद्योग सुरक्षित रह सकें।

    3. ऊर्जा सुरक्षा और भारत की भू-अर्थव्यवस्था

    भारत ऊर्जा आयात पर निर्भर है, इसलिए ऊर्जा सुरक्षा उसकी रणनीति का मुख्य आधार है। पश्चिम एशिया—सऊदी अरब, UAE, कतर—भारत के प्रमुख ऊर्जा साझेदार हैं।
    रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता दिखाते हुए सस्ता रूसी तेल खरीदा, जिससे ऊर्जा लागत कम हुई और आर्थिक स्थिरता बनी रही।

    नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में International Solar Alliance के माध्यम से भारत वैश्विक नेतृत्व स्थापित कर रहा है। 2030 तक 450 GW renewable क्षमता का लक्ष्य भारत को clean energy में विश्व-स्तरीय शक्ति बना सकता है।

    4. कनेक्टिविटी और अवसंरचना आधारित भू-अर्थशास्त्र

    वैश्विक प्रभाव उन देशों को मिलता है जिनका व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण होता है। इसी उद्देश्य से भारत ने IMEC (India-Middle East-Europe Economic Corridor) में प्रमुख भूमिका निभाई है, जो चीन की BRI का सशक्त विकल्प है।

    चाबहार बंदरगाह—भारत की मध्य एशिया तक पहुँच—पाकिस्तान को भू-राजनीतिक बाधा के रूप में बायपास करता है।
    INSTC (India-Iran-Russia Corridor) यूरोप तक तेज़ और सस्ता व्यापार मार्ग खोलता है।
    ये गलियारे भारत को वैश्विक सप्लाई मैप का केंद्र बना रहे हैं।

    5. तकनीकी भू-अर्थशास्त्र: भविष्य की शक्ति

    आज तकनीक ही आर्थिक और रणनीतिक शक्ति का मूल है। भारत semiconductor उद्योग विकसित कर रहा है और अमेरिका, जापान व ताइवान के साथ साझेदारी को मजबूत कर रहा है।
    डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर—UPI, आधार—विश्वभर में अपनाया जा रहा है, जिससे भारत की “डिजिटल कूटनीति” प्रभावशाली बन रही है।

    5G/6G नेटवर्क में सुरक्षित और विश्वसनीय तकनीक को प्राथमिकता देकर भारत ने अपनी तकनीकी संप्रभुता को मजबूत किया है।

    6. मुद्रा और वित्तीय भू-अर्थशास्त्र

    भारत अपनी आर्थिक स्वतंत्रता को बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रुपये के उपयोग को बढ़ावा दे रहा है। रूस, श्रीलंका और मॉरीशस जैसे देशों ने इसे स्वीकार किया है।
    G20 अध्यक्षता के दौरान भारत ने वैश्विक दक्षिण (Global South) के देशों की आवाज़ को मजबूत किया और ऋण सुधारों पर वैश्विक चर्चा को आगे बढ़ाया।

    7. प्रमुख चुनौतियाँ

    चीन की विशाल विनिर्माण क्षमता और आर्थिक प्रभुत्व भारत की प्रमुख चुनौती है।
    घरेलू अवसंरचना, skill development, logistics लागत और तकनीकी क्षमता में सुधार आवश्यक है।
    ऊर्जा निर्भरता और FTA वार्ताओं में घरेलू क्षेत्रों की चिंता भी संतुलित निर्णय मांगती है।

    निष्कर्ष:
    भारत की भू-अर्थशास्त्रीय रणनीति आर्थिक शक्ति, कूटनीति, तकनीक और अवसंरचना को एकीकृत करके बनाई गई व्यापक राष्ट्रीय रणनीति है।
    इसका लक्ष्य भारत को बहुध्रुवीय विश्व में एक स्वतंत्र, प्रभावशाली और स्थिर शक्ति के रूप में स्थापित करना है।
    भविष्य निश्चित रूप से भारत की भू-अर्थव्यवस्था के माध्यम से ही आकार लेगा।
  • विदेश नीति और राष्ट्रीय हित

    प्रस्तावना

    विदेश नीति वह तरीका है जिससे कोई देश दूसरे देशों से रिश्ते बनाता है। नीतियाँ देश के राष्ट्रीय हित को हासिल करने के लिए बनाई जाती हैं—जैसे सुरक्षा, विकास, सम्मान और पर्यावरण की देखभाल।

    याद रखें: लक्ष्य (Ends) = राष्ट्रीय हित, तरीके (Ways) = रणनीति और साधन (Means) = कूटनीति, सेना, अर्थव्यवस्था, तकनीक। अच्छी नीति इन तीनों में सही मेल बैठाती है।

    1) राष्ट्रीय हित क्या है?

    राष्ट्रीय हित वे बातें हैं जिन्हें देश सबसे ज़रूरी मानता है—जैसे सीमाओं की सुरक्षा, लोगों की भलाई, अर्थव्यवस्था की तरक्की, दुनिया में सम्मान, और प्रकृति की रक्षा।

    • हित बदल सकते हैं, क्योंकि दुनिया बदलती रहती है।
    • कुछ हित स्थायी होते हैं (जैसे सुरक्षा), कुछ समय के साथ बदलते हैं (जैसे कोई व्यापार समझौता)।
    • हित केवल सैन्य नहीं—अर्थव्यवस्था, संस्कृति और तकनीक भी शामिल हैं।

    2) सोच के प्रमुख तरीके (थ्योरी)

    • यथार्थवाद: शक्ति और सुरक्षा पहले।
    • उदारवाद: मिलकर काम करने से सबको फायदा—संस्थाएँ और नियम मदद करते हैं।
    • रचनावाद: देश की पहचान और विचार उसके हित तय करते हैं।
    • कौटिल्य परंपरा: साम-दाम-दंड-भेद; स्थितियों के हिसाब से समझदारी।

    3) Ends–Ways–Means

    • Ends (लक्ष्य): सुरक्षा, समृद्धि, सम्मान, मूल्य-आधारित नेतृत्व।
    • Ways (तरीके): साझेदारी, संतुलन, बहुपक्षीय मंच, जन-कूटनीति, आर्थिक कूटनीति।
    • Means (साधन): सेना, अर्थव्यवस्था, तकनीक, भूगोल/समुद्र, मानव-पूँजी, सॉफ्ट पावर।

    टिप: लक्ष्य वास्तविक रखें, साधन उपलब्ध रखें, और तरीके लचीले रखें।

    4) हितों के प्रकार

    • कोर/Vital: अस्तित्व, संप्रभुता, सीमा-सुरक्षा।
    • महत्वपूर्ण: व्यापार, ऊर्जा, तकनीक, सप्लाई-चेन।
    • परिधीय: सांस्कृतिक आदान-प्रदान, खेल-कूटनीति आदि।
    • दीर्घकालिक बनाम तात्कालिक: कुछ लक्ष्य लंबे समय के, कुछ तुरंत के लिए।

    5) नीति को प्रभावित करने वाले कारण

    • भूगोल, इतिहास और देश की क्षमता
    • घरेलू राजनीति और नेतृत्व की सोच
    • दुनिया की ताकतों का संतुलन और अंतरराष्ट्रीय कानून

    6) राज्य-शक्ति के साधन

    • कूटनीति: शिखर बैठकें, बैक-चैनल, ट्रैक-II, जनता व प्रवासी से संवाद।
    • आर्थिक साधन: FTA, FDI, सहायता, प्रतिबंध।
    • सुरक्षा: प्रतिरोधक क्षमता, संयुक्त अभ्यास, लॉजिस्टिक्स।
    • बहुपक्षीय मंच: UN, G20, BRICS, SCO, QUAD।
    • टेक/साइबर/अंतरिक्ष और आपदा-राहत (HADR)।

    7) भारत के राष्ट्रीय हित

    • सुरक्षा: सीमा-सुरक्षा, आतंक-विरोध, भरोसेमंद परमाणु प्रतिरोधक, हिंद महासागर में शांति।
    • अर्थव्यवस्था: तेज और समावेशी विकास, ऊर्जा/खाद्य/क्रिटिकल मिनरल सुरक्षा, नवाचार व निवेश।
    • भूराजनीति: इंडो-पैसिफिक में संतुलन और समुद्री मार्गों की सुरक्षा; रणनीतिक स्वायत्तता
    • सॉफ्ट पावर: प्रवासी भारतीय, योग-आयुर्वेद-फिल्म, डिजिटल पब्लिक गुड्स।
    • वैश्विक जिम्मेदारी: जलवायु नेतृत्व (ISA, CDRI, LiFE) और मानवीय सहायता।

    8) भारत की मुख्य नीतियाँ

    • पंचशील, गुटनिरपेक्षता (NAM), गुजराल सिद्धांत।
    • Look East → Act East, Neighbourhood First, SAGAR।
    • रणनीतिक स्वायत्तता, टेक/डिजिटल कूटनीति, वैक्सीन व मानवीय कूटनीति।

    9) केस स्टडी

    • 1947–62: गुटनिरपेक्षता—स्वतंत्र निर्णय; चीन-पाक चुनौतियाँ।
    • 1971: बांग्लादेश युद्ध और सोवियत संधि—क्षेत्रीय सुरक्षा व मानवता।
    • 1974/1998: परमाणु परीक्षण—लंबे समय के लिए सुरक्षा।
    • 1991 के बाद: उदारीकरण—आर्थिक कूटनीति और सप्लाई-चेन में जुड़ाव।
    • 2008: भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु—ऊर्जा और हाई-टेक पहुँच।
    • हाल में: QUAD/Indo-Pacific, Neighbourhood First/SAGAR, रूस-यूक्रेन पर संतुलन, RCEP से बाहर, चाबहार/INSTC।

    10) आज की चुनौतियाँ व मौके

    • अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन।
    • चीन-पाक कारक और grey-zone चुनौतियाँ।
    • इंडो-पैसिफिक समुद्री मार्ग और HADR।
    • ऊर्जा/खाद्य/मिनरल सुरक्षा और हरित परिवर्तन।
    • सेमिकंडक्टर, AI, क्वांटम, स्पेस—साझेदारी + घरेलू निर्माण।

    11) संस्थागत ढाँचा

    • PM/PMO, NSCS/NSA, CCS—ऊपर से समन्वय।
    • MEA, दूतावास, DPA—नीति बनाना और लागू करना।
    • रक्षा/वित्त/वाणिज्य/ऊर्जा/आईटी—सभी मंत्रालय मिलकर।
    • सशस्त्र बल, खुफिया, कोस्ट गार्ड—सुरक्षा व HADR।
    • संसदीय समितियाँ, थिंक-टैंक, उद्योग, राज्य, प्रवासी—फीडबैक व साझेदारी।

    12) निष्कर्ष

    विदेश नीति साधन है और राष्ट्रीय हित लक्ष्य। समय के साथ तरीकों में बदलाव हो सकता है, पर लक्ष्य—सुरक्षा, समृद्धि, सम्मान और मूल्य—स्थिर रहते हैं। सफल नीति वही है जो Ends–Ways–Means को जोड़ती है।

    13) आँकड़ा-सारणी

    मंच/संधि उद्देश्य/केंद्र वर्ष/स्थिति
    पंचशील (India–China) शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व 1954
    NAM स्वतंत्र विदेश-नीति 1961
    Indo–Soviet Treaty मित्रता/संतुलन 1971
    SAARC क्षेत्रीय सहयोग 1985
    BIMSTEC बे ऑफ बंगाल सहयोग 1997
    ASEAN–India साझेदारी पूर्व/दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़ाव 1992/1996/2002
    BRICS / NDB उभरती अर्थव्यवस्थाएँ/वित्त 2009/2011/2014
    G20 (भारत) वैश्विक आर्थिक समन्वय 1999; 2023 अध्यक्षता
    SCO यूरेशियन सुरक्षा/कनेक्टिविटी भारत 2017
    QUAD इंडो-पैसिफिक सहयोग/समुद्री सुरक्षा 2007; 2017 पुनर्जीवित
    India–US Civil Nuclear ऊर्जा/टेक पहुँच 2008
    LEMOA/COMCASA/BECA लॉजिस्टिक्स/संचार/भौ-स्थानिक 2016/2018/2020
    IPEF सप्लाई-चेन/क्लीन/फेयर इकोनॉमी 2022
    ISA / CDRI सौर गठबंधन / आपदा-रोधी अवसंरचना 2015 / 2019
    चाबहार / INSTC ईरान–कॉकस–मध्य एशिया–रूस कनेक्टिविटी 2016 / प्रगति पर

    14) भारत बनाम चीन (सार)

    भारत: रणनीतिक स्वायत्तता, नियम-आधारित व्यवस्था। चीन: तेज क्षमता-वृद्धि और व्यापक प्रभाव।

    भारत: विविध सप्लाई-चेन, PLI, सेमिकंडक्टर। चीन: बड़ा विनिर्माण-हब और निवेश।

    भारत: SAGAR, IOR में HADR। चीन: बंदरगाह साझेदारी व समुद्री उपस्थिति।

    भारत: औपचारिक सैन्य गठबंधन नहीं; QUAD, BRICS, SCO, G20 में सक्रिय। चीन: BRICS, SCO, AIIB, RCEP।

    15) अभ्यास MCQs

    1. Ends–Ways–Means में Ways का मतलब— (a) लक्ष्य (b) रणनीति/पथ (c) साधन (d) वैधता
    2. कोर हित— (a) खेल कूटनीति (b) निर्यात विविधीकरण (c) क्षेत्रीय अखंडता (d) सांस्कृतिक आदान-प्रदान
    3. विदेश-नीति का औज़ार नहीं— (a) कूटनीति (b) आर्थिक स्टेटक्राफ्ट (c) सैन्य प्रतिरोधक (d) चुनाव आयोग
    4. पंचशील औपचारिक वर्ष— (a) 1947 (b) 1954 (c) 1961 (d) 1971
    5. NAM का उद्देश्य— (a) सैन्य गठबंधन (b) स्वतंत्र विदेश-नीति (c) मुद्रा-संघ (d) परमाणु-साझा
    6. 2008 India–US Civil Nuclear— (a) सीमा समझौता (b) ऊर्जा/टेक पहुँच (c) कृषि सुधार (d) स्पेस लॉन्च
    7. QUAD पुनर्जीवन— (a) 2004 (b) 2007 (c) 2017 (d) 2021
    8. SCO सदस्यता (भारत)— (a) 2005 (b) 2017 (c) 2019 (d) 2023
    9. IPEF में भारत— (a) 2014 (b) 2017 (c) 2020 (d) 2022
    10. LEMOA/COMCASA/BECA— (a) भारत-रूस कृषि (b) भारत-US रक्षा (c) भारत-EU जलवायु (d) भारत-जापान संस्कृति
    11. रणनीतिक स्वायत्तता— (a) किसी फोरम में न जाना (b) मुद्दा-आधारित कई साझेदारियाँ + स्वतंत्र निर्णय (c) स्थायी सैन्य गठबंधन (d) केवल व्यापार
    12. SAGAR— (a) हिमालयी पर्यटन (b) हिंद महासागर में सुरक्षा व विकास (c) साइबर सुरक्षा (d) अंतरिक्ष अनुसंधान

    Answer Key

    1) (b)

    2) (c)

    3) (d)

    4) (b)

    5) (b)

    6) (b)

    7) (c)

    8) (b)

    9) (d)

    10) (b)

    11) (b)

    12) (b)

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  • भारत की विदेश नीति : प्रमुख सिद्धांत एवं निर्धारक कारक

    भारत की विदेश नीति : प्रमुख सिद्धांत एवं निर्धारक कारक





    प्रस्तावना



    विदेश नीति (Foreign Policy) किसी भी राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दिशा और रणनीति को निर्धारित करती है। भारत जैसे विशाल भू-भाग, सांस्कृतिक विरासत और जनसंख्या वाले देश के लिए विदेश नीति केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक विकास, वैश्विक सहयोग, क्षेत्रीय नेतृत्व और सभ्यतागत मूल्यों की अभिव्यक्ति भी है।

    भारत की विदेश नीति के दो प्रमुख आयाम हैं :

    1. Key Principles (मुख्य सिद्धांत) – जिन पर यह नीति आधारित है।


    2. Determinants (निर्धारक कारक) – वे परिस्थितियाँ और तत्व जो इस नीति को आकार देते हैं।






    1. भारत की विदेश नीति के प्रमुख सिद्धांत (Key Principles)


    (क) गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment)


    भारत की विदेश नीति का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत।

    शीत युद्ध के समय भारत ने अमेरिका और सोवियत संघ दोनों ध्रुवों से दूरी बनाए रखी।

    नेहरू और टिटो, नासिर, नक्रूमा आदि नेताओं के सहयोग से Non-Aligned Movement (NAM) की स्थापना।


    (ख) पंचशील सिद्धांत (Panchsheel Principles)


    1954 में चीन के साथ हुए समझौते में पाँच सिद्धांत :

    1. एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान।
    2. एक-दूसरे पर आक्रमण न करना।
    3. आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।
    4. समानता और परस्पर लाभ।
    5. शांतिपूर्ण सहअस्तित्व।


    (ग) शांति और सहअस्तित्व


    भारत की विदेश नीति हमेशा युद्ध-विरोधी और शांति-समर्थक रही है।

    संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशनों में भारत की सक्रिय भागीदारी।


    (घ) उपनिवेशवाद और रंगभेद का विरोध

    भारत ने अफ्रीकी देशों में स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन किया।

    दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद नीति का विरोध करने वाले शुरुआती देशों में भारत प्रमुख था।


    (ङ) सार्वभौमिकता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग

    भारत ने हमेशा अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर का सम्मान किया।

    वैश्विक समस्याओं (जैसे जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, महामारी) के समाधान में सहयोग का आह्वान।


    (ज) प्रवासी भारतीय नीति


    प्रवासी भारतीयों (NRIs, PIOs) के साथ संबंधों को मजबूत करना।

    सांस्कृतिक कूटनीति (Cultural Diplomacy) के माध्यम से भारत की Soft Power को बढ़ावा देना।





    2. भारत की विदेश नीति के निर्धारक कारक (Determinants)



    विदेश नीति केवल आदर्शों से नहीं चलती, बल्कि उसे कई आंतरिक और बाहरी कारक आकार देते हैं।

    (क) भौगोलिक कारक (Geographical Factors)

    भारत का स्थान – एशिया के केंद्र में, दक्षिण एशिया का हृदय।

    उत्तर में हिमालय और दक्षिण में हिंद महासागर।

    7 देशों से सीमा लगती है – पाकिस्तान, चीन, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार, अफगानिस्तान (POK के माध्यम से)।
    इस भौगोलिक स्थिति ने भारत की विदेश नीति में सुरक्षा और पड़ोसी संबंधों को प्राथमिकता दी।


    (ख) ऐतिहासिक अनुभव (Historical Legacy)

    औपनिवेशिक शोषण ने भारत को आत्मनिर्भरता और स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने के लिए प्रेरित किया।

    स्वतंत्रता संग्राम के मूल्यों (अहिंसा, सत्य, स्वतंत्रता) ने विदेश नीति को नैतिक आधार दिया।


    (ग) आर्थिक कारक (Economic Factors)

    1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण।

    ऊर्जा सुरक्षा (Oil, Gas), व्यापार समझौते (FTA), तकनीकी सहयोग, विदेशी निवेश भारत की विदेश नीति के निर्धारक बने।

    “Make in India”, “Digital India” जैसी पहलें भी वैश्विक सहयोग से जुड़ी हैं।


    (घ) राजनीतिक प्रणाली और नेतृत्व (Political System & Leadership)

    लोकतांत्रिक ढांचा – भारत की विदेश नीति जनमत और संसदीय नियंत्रण से प्रभावित होती है।

    नेतृत्व का व्यक्तित्व –

    नेहरू – आदर्शवादी।

    इंदिरा गांधी – यथार्थवादी और दृढ़।

    वाजपेयी – परमाणु शक्ति और शांति का मिश्रण।

    मोदी – सक्रिय और आक्रामक कूटनीति।



    (ङ) सुरक्षा और रक्षा (Security & Defence)

    पड़ोस में चीन और पाकिस्तान जैसे प्रतिद्वंद्वी।

    आतंकवाद, सीमा विवाद, समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा विदेश नीति के प्रमुख मुद्दे।

    रक्षा साझेदारी (USA, रूस, फ्रांस, इजरायल) निर्धारक बन चुकी है।


    (च) अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य (International Context)

    शीत युद्ध, वैश्वीकरण, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था।

    संयुक्त राष्ट्र, WTO, IMF, World Bank जैसी संस्थाओं का प्रभाव।

    रूस-यूक्रेन युद्ध, अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता जैसी घटनाएँ विदेश नीति को प्रभावित करती हैं।


    (छ) जनमत और मीडिया (Public Opinion & Media)

    लोकतांत्रिक भारत में मीडिया, सोशल मीडिया और जनमत विदेश नीति को प्रभावित करते हैं।

    उदाहरण : 1999 कारगिल युद्ध के समय मीडिया की भूमिका।


    (ज) सांस्कृतिक और सभ्यतागत तत्व (Civilizational & Cultural Factors)

    भारत की सभ्यता का दर्शन : “वसुधैव कुटुंबकम्”।

    योग, आयुर्वेद, बॉलीवुड, आईटी उद्योग और प्रवासी भारतीय भारत की सॉफ्ट पावर के निर्धारक हैं।


    (झ) वैश्विक संकट और अवसर (Global Crises & Opportunities)

    कोविड-19 महामारी के दौरान “वैक्सीन मैत्री” पहल।

    जलवायु परिवर्तन और सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) में भारत की अग्रणी भूमिका।





    3. प्रमुख उदाहरण

    1971 : बांग्लादेश युद्ध ने क्षेत्रीय शक्ति के रूप में भारत की भूमिका को सिद्ध किया।

    1998 : परमाणु परीक्षणों ने भारत की रणनीतिक पहचान को बदला।

    2008 : भारत-अमेरिका परमाणु समझौता।

    2023 G20 शिखर सम्मेलन : भारत को वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में प्रस्तुत किया।





    निष्कर्ष


    भारत की विदेश नीति का निर्माण सिद्धांतों और निर्धारक कारकों के संयुक्त प्रभाव से हुआ है।

    सिद्धांत : शांति, गुटनिरपेक्षता, पंचशील, रणनीतिक स्वायत्तता, प्रवासी भारतीयों से संपर्क।

    निर्धारक : भूगोल, इतिहास, राजनीति, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, वैश्विक संकट और सभ्यतागत मूल्य।


    आज भारत की विदेश नीति का मूल मंत्र है—
    “राष्ट्रहित सर्वोपरि, किन्तु विश्वकल्याण का संकल्प भी।”

  • भारत की विदेश नीति : ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, निरंतरता और परिवर्तन







    प्रस्तावना

    भारत की विदेश नीति (Foreign Policy of India) केवल कूटनीति का औजार नहीं है, बल्कि यह भारत की सभ्यतागत परंपराओं, स्वतंत्रता संग्राम की आकांक्षाओं और बदलते वैश्विक परिदृश्य का प्रतिबिंब भी है। “Foreign Policy” का शाब्दिक अर्थ है – वह नीति जिसके माध्यम से कोई राष्ट्र अन्य राष्ट्रों के साथ अपने राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक संबंधों को परिभाषित करता है।

    भारत की विदेश नीति की विशेषता यह रही है कि इसमें निरंतरता और परिवर्तन दोनों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। स्वतंत्रता के बाद से लेकर आज तक, भारत ने शांति, सहअस्तित्व और गुटनिरपेक्षता जैसे मूल्यों को बनाए रखा, किंतु समय के साथ बदलती परिस्थितियों ने उसे रणनीतिक गठबंधनों, आर्थिक उदारीकरण और वैश्विक शक्ति-संतुलन की राजनीति की ओर भी प्रेरित किया।




    1. ऐतिहासिक जड़ें : प्राचीन और मध्यकालीन भारत

    भारत की विदेश नीति का आधार केवल आधुनिक काल में नहीं बल्कि प्राचीन काल से मिलता है।

    अशोक और धम्म नीति : मौर्य सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में “धम्म विजय” को अपनाया और पड़ोसी राज्यों के साथ संबंधों में शांति और सहअस्तित्व को बढ़ावा दिया। बौद्ध धर्म के प्रसार ने एशियाई देशों में भारत की सॉफ्ट पावर को स्थापित किया।

    मध्यकालीन भारत : इस्लाम, सूफीवाद और व्यापारिक संबंधों ने पश्चिम एशिया तथा मध्य एशिया से भारत के रिश्तों को प्रभावित किया।

    सभ्यतागत दृष्टिकोण : भारतीय परंपरा “वसुधैव कुटुंबकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे विचारों पर आधारित रही, जिसने भारत को विश्व शांति और मानव कल्याण का पक्षधर बनाया।





    2. औपनिवेशिक काल और विदेश नीति पर प्रभाव

    1757 से 1947 तक भारत ब्रिटिश साम्राज्य का उपनिवेश था। इस दौरान भारत की कोई स्वतंत्र विदेश नीति नहीं थी।

    ब्रिटेन ने भारत की भौगोलिक, सैन्य और आर्थिक शक्ति का उपयोग अपने साम्राज्य विस्तार के लिए किया।

    दोनों विश्वयुद्धों में भारतीय सैनिकों की भागीदारी भारत की स्वतंत्र इच्छा से नहीं, बल्कि ब्रिटिश नीतियों के कारण थी।

    हालांकि इस काल में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं ने स्पष्ट कहा कि स्वतंत्र भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाएगा।





    3. स्वतंत्रता संग्राम और विदेश नीति की वैचारिक नींव

    स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ही भारतीय नेताओं ने विदेश नीति के सिद्धांतों पर विचार किया।

    महात्मा गांधी : उन्होंने सत्य, अहिंसा और नैतिकता को राजनीति ही नहीं, विदेश संबंधों का भी आधार बताया।

    जवाहरलाल नेहरू : अंतरराष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण रखते थे। वे गुटनिरपेक्षता, उपनिवेशवाद विरोध और शांति के समर्थक थे।

    सुभाष चंद्र बोस : उन्होंने यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए माना कि भारत को अपने हितों की रक्षा के लिए रणनीतिक सहयोग करना चाहिए।





    4. स्वतंत्र भारत की विदेश नीति : नेहरू युग (1947–1964)

    भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू स्वयं विदेश मंत्री भी थे। उन्होंने भारत की विदेश नीति की नींव रखी।

    गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) : शीत युद्ध की दो ध्रुवीय राजनीति (अमेरिका बनाम सोवियत संघ) से दूरी रखते हुए भारत ने स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई।

    पंचशील सिद्धांत : 1954 में चीन के साथ हुए समझौते में पंचशील (शांति से सहअस्तित्व के 5 सिद्धांत) को महत्व दिया गया।

    औपनिवेशिक-विरोध : भारत ने एशिया और अफ्रीका के स्वतंत्रता आंदोलनों का समर्थन किया।

    संयुक्त राष्ट्र में भूमिका : भारत ने शांति सैनिक मिशनों में सक्रिय भागीदारी की।





    5. इंदिरा गांधी युग (1966–1984)

    इंदिरा गांधी के समय विदेश नीति में यथार्थवाद (Realism) बढ़ा।

    1971 का बांग्लादेश युद्ध : भारत ने निर्णायक भूमिका निभाई और पाकिस्तान के दो टुकड़े हुए।

    सोवियत संघ से करीबी : 1971 में भारत-सोवियत मैत्री संधि हुई।

    परमाणु परीक्षण (1974) : “स्माइलिंग बुद्धा” के नाम से पहला परमाणु परीक्षण किया गया।





    6. राजीव गांधी और शीत युद्ध का अंत (1984–1989)

    आधुनिक तकनीक, कंप्यूटर और आईटी सहयोग पर ध्यान।

    अमेरिका से संबंध सुधारने की शुरुआत।

    श्रीलंका में शांति सेना भेजना (IPKF)।





    7. 1991 के बाद का युग : उदारीकरण और वैश्वीकरण

    आर्थिक सुधार (नरसिम्हा राव सरकार) : विदेश नीति में आर्थिक कूटनीति का महत्व बढ़ा।

    “Look East Policy” : दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से सहयोग पर जोर।

    अमेरिका और यूरोप से संबंधों का विस्तार।





    8. वाजपेयी युग (1998–2004)

    परमाणु परीक्षण (1998) : भारत को परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित किया।

    लाहौर बस यात्रा और बाद में कारगिल युद्ध : शांति और यथार्थ का मिश्रण।

    आईटी डिप्लोमेसी : भारत की सॉफ्ट पावर को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया।





    9. मनमोहन सिंह युग (2004–2014)

    भारत-अमेरिका परमाणु समझौता (2008) : ऐतिहासिक मोड़, जिसने भारत को वैश्विक परमाणु व्यवस्था में वैध दर्जा दिलाया।

    आर्थिक विकास और वैश्विक निवेश को विदेश नीति का प्रमुख अंग बनाया।





    10. मोदी युग (2014–वर्तमान)

    Neighbourhood First Policy और Act East Policy को सक्रिय किया।

    सॉफ्ट पावर और प्रवासी भारतीयों से संपर्क।

    ग्लोबल मंचों पर सक्रियता : G20, BRICS, QUAD आदि में भारत की अग्रणी भूमिका।

    रणनीतिक स्वायत्तता : रूस-यूक्रेन युद्ध के समय भारत ने किसी एक ध्रुव का पक्ष न लेकर राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी।





    11. निरंतरता और परिवर्तन

    निरंतरता : शांति, सहअस्तित्व, गुटनिरपेक्षता, विकासशील देशों से सहयोग।

    परिवर्तन :

    1962 के बाद सुरक्षा दृष्टिकोण।

    1971 के बाद क्षेत्रीय शक्ति की भूमिका।

    1991 के बाद आर्थिक कूटनीति।

    21वीं सदी में आतंकवाद, ऊर्जा सुरक्षा और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था पर ध्यान।






    12. एस. जयशंकर द्वारा बताए गए भारत की विदेश नीति के 6 चरण

    विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने भारत की विदेश नीति के विकास को 6 चरणों में विभाजित किया है :

    1. 1947–1962 (आदर्शवाद और गुटनिरपेक्षता)

    नेहरू के नेतृत्व में नैतिकता, शांति और गुटनिरपेक्षता पर बल।



    2. 1962–1971 (सुरक्षा चिंताओं का उदय)

    1962 के चीन युद्ध और 1965 के भारत-पाक युद्ध के बाद सुरक्षा और रक्षा तैयारियों पर ध्यान।



    3. 1971–1991 (क्षेत्रीय शक्ति के रूप में भारत)

    बांग्लादेश युद्ध, सोवियत संघ के साथ करीबी, और परमाणु परीक्षण।



    4. 1991–1998 (आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण)

    Look East Policy और नई आर्थिक नीति ने विदेश नीति को आर्थिक दृष्टि से जोड़ा।



    5. 1998–2014 (रणनीतिक स्वायत्तता और बहुध्रुवीय विश्व)

    वाजपेयी से मनमोहन सिंह तक—परमाणु शक्ति, अमेरिका के साथ निकटता, और वैश्विक बहुध्रुवीय राजनीति में सक्रियता।



    6. 2014–वर्तमान (नए भारत की विदेश नीति)

    नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में प्रवासी भारतीयों, वैश्विक मंचों पर नेतृत्व, पड़ोस नीति, क्वाड और हिंद-प्रशांत रणनीति पर जोर।

    भारत को “Vishwa Guru” और “Leading Power” बनाने का प्रयास।







    निष्कर्ष

    भारत की विदेश नीति का सफर आदर्शवाद से यथार्थवाद, गुटनिरपेक्षता से रणनीतिक स्वायत्तता और विकासशील देशों की एकजुटता से वैश्विक नेतृत्व तक का रहा है।
    एस. जयशंकर के 6 चरण इस विकास यात्रा को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं—जहाँ प्रत्येक चरण में भारत ने अपनी सीमाओं और अवसरों के अनुसार विदेश नीति को ढाला।

    आज भारत की विदेश नीति का मूल मंत्र है—
    👉 “राष्ट्रहित सर्वोपरि” (National Interest First),
    जिसमें शांति और सहअस्तित्व की परंपरा भी है और 21वीं सदी के वैश्विक नेतृत्व की महत्वाकांक्षा भी।