विषय सूची (Table of Contents)
1. परिचय: विधेयक क्या है?
संसद का प्राथमिक कार्य देश के लिए कानून बनाना है। कानून बनाने की प्रक्रिया एक प्रस्ताव से शुरू होती है जिसे ‘विधेयक’ (Bill) कहा जाता है। जब यह विधेयक संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) द्वारा पारित हो जाता है और राष्ट्रपति उस पर अपनी स्वीकृति दे देते हैं, तब वह ‘अधिनियम’ (Act) या कानून बन जाता है।
अनुच्छेद 107 में विधेयकों को पुरःस्थापित (Introduce) करने और पारित करने के उपबंध दिए गए हैं।
2. विधेयकों का वर्गीकरण (Types of Bills)
भारतीय संसद में प्रस्तुत किए जाने वाले विधेयकों को मुख्य रूप से चार श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
- 1. साधारण विधेयक (Ordinary Bill): वित्तीय विषयों के अलावा अन्य सभी मामलों से संबंधित (अनुच्छेद 107)।
- 2. धन विधेयक (Money Bill): कराधान, सरकारी खर्च और ऋण आदि से संबंधित (अनुच्छेद 110)।
- 3. वित्त विधेयक (Financial Bill): वित्तीय मामलों से संबंधित (अनुच्छेद 117)।
- 4. संविधान संशोधन विधेयक: संविधान के प्रावधानों में बदलाव के लिए (अनुच्छेद 368)।
3. कानून बनने के चरण (Stages of Law Making)
एक साधारण विधेयक को अधिनियम बनने के लिए प्रत्येक सदन में तीन वाचनों (Readings) से गुजरना पड़ता है:
(A) प्रथम वाचन (First Reading)
इस चरण में विधेयक को सदन में प्रस्तुत (Introduce) किया जाता है। मंत्री या सदस्य सदन की अनुमति मांगता है। इस स्तर पर कोई चर्चा नहीं होती। विधेयक को भारत के राजपत्र (Gazette) में प्रकाशित किया जाता है।
(B) द्वितीय वाचन (Second Reading)
यह सबसे महत्वपूर्ण और विस्तृत चरण है। इसमें विधेयक की धारावार (Clause-by-clause) समीक्षा होती है। इसके तीन उप-चरण होते हैं:
- साधारण बहस: विधेयक के मूल सिद्धांतों पर चर्चा होती है।
- समिति अवस्था (Committee Stage): विधेयक को प्रवर समिति (Select Committee) के पास सूक्ष्म जांच के लिए भेजा जाता है।
- विचार अवस्था: समिति की रिपोर्ट पर सदन में चर्चा होती है और सदस्य संशोधन प्रस्ताव रख सकते हैं।
(C) तृतीय वाचन (Third Reading)
इस चरण में विधेयक पर केवल ‘संपूर्ण रूप से’ चर्चा होती है। कोई संशोधन नहीं किया जा सकता। विधेयक को या तो स्वीकार किया जाता है या अस्वीकार। यदि बहुमत इसे पास कर देता है, तो इसे पीठासीन अधिकारी द्वारा प्रमाणित करके दूसरे सदन में भेज दिया जाता है।
(D) दूसरे सदन में विधेयक
दूसरे सदन में भी विधेयक इन्हीं तीन चरणों से गुजरता है। दूसरा सदन:
- विधेयक को बिना संशोधन के पारित कर सकता है।
- कुछ संशोधनों के साथ वापस भेज सकता है।
- विधेयक को अस्वीकार कर सकता है।
- विधेयक पर कोई कार्यवाही नहीं करता (6 महीने तक लंबित रखना)।
4. संयुक्त अधिवेशन (Joint Sitting) – अनुच्छेद 108
यदि किसी साधारण विधेयक पर दोनों सदनों में गतिरोध (Deadlock) उत्पन्न हो जाए (जैसे- दूसरा सदन विधेयक को अस्वीकार कर दे या 6 महीने से अधिक समय बीत जाए), तो राष्ट्रपति दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुला सकते हैं।
- संयुक्त अधिवेशन केवल साधारण विधेयकों पर बुलाया जा सकता है (धन विधेयक या संविधान संशोधन पर नहीं)।
- इसकी अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करता है।
- निर्णय उपस्थित सदस्यों के बहुमत से लिया जाता है।
5. राष्ट्रपति की स्वीकृति (Assent to Bill) – अनुच्छेद 111
दोनों सदनों से पारित होने के बाद विधेयक राष्ट्रपति के पास जाता है। अनुच्छेद 111 के तहत राष्ट्रपति के पास तीन विकल्प होते हैं:
- वह विधेयक को स्वीकृति दे देते हैं (विधेयक कानून बन जाता है)।
- वह स्वीकृति सुरक्षित रख लेते हैं (विधेयक समाप्त हो जाता है)।
- वह विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा देते हैं (यदि वह धन विधेयक नहीं है)। यदि संसद इसे दोबारा (संशोधन के साथ या बिना) पारित कर देती है, तो राष्ट्रपति को स्वीकृति देनी ही पड़ती है।
इस प्रकार, भारतीय संसद की विधायी प्रक्रिया अत्यंत व्यापक और व्यवस्थित है, जो यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी कानून जल्दबाजी में न बनाया जाए।
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